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भरतपुर के ताज पर तलवार, घना के बाहर बसाई परिंदों ने अपनी दुनिया

- घना को नहीं मिल रहा पूरा पानी

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भरतपुर के ताज पर तलवार, घना के बाहर बसाई परिंदों ने अपनी दुनिया

भरतपुर के ताज पर तलवार, घना के बाहर बसाई परिंदों ने अपनी दुनिया

भरतपुर . भरतपुर के ताज पर सूखे ने तलवार लटका दी है। पक्षियों की नगरी के नाम से दुनियाभर में ख्याति बटोर चुका केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान इन दिनों पानी का संकट झेल रहा है। पानी की कमी के चलते यहां परिंदों की उड़ान थम सी गई है। इसी का नतीजा है कि कुछ परिंदों ने अपनी दुनिया घना के बाहर पानी वाले क्षेत्र में बसा ली है। जानकारों का कहना है कि यदि यही आलम रहा तो यूनेस्को घना को बर्ड हेरिटेज साइट से हटा सकता है।
केवलादेव घना में सुदूर देशों से बहुतेरे पक्षी सर्दियों के सीजन में आते हैं। साथ ही हजारों स्थानीय पक्षी भी यहां ब्रीडिंग करते हैं। घना की छिछली झीलों में इन्हें पर्याप्त भोजन और पानी मिल जाता है। पक्षियों की इस खूबसूरत दुनिया को निहारने के लिए देश-विदेश से बड़ी संख्या में यहां सैलानी पहुंचते हैं। सर्दियों के मौसम में घना देशी-विदेशी पर्यटकों से आबाद रहता है, लेकिन इस बार पानी की कमी ने घना की रंगीन दुनिया को उजाड़ सा दिया है। वर्ष भर रहने वाले स्थानीय पक्षियों का भी यहां से मोहभंग हुआ है। ऐसे में उन्होंने गांव मलाह के पास घना की बाउंड्री के पास नया ठिकाना तलाशा है। यहां भरे रहने वाली पानी के पास पक्षियों की नई दुनिया बसी है। जानकारों का कहना है कि घना से पानी की कमी दूर नहीं हुई तो सर्दियों के मौसम में यहां आशियाना बनाने वाले पक्षी फुर्र हो सकते हैं। मानसून रूठा रहने के कारण बारिश के मौसम में भी इस बार घना को पूरा पानी नहीं मिला। ऐसे में यहां की झीलें सूखी रह गईं। ऐसे में घना में वर्ष भर रहने वाली चहचहाहट इस बार कम सुनाई दे रही है।

50 हजार लोगों का सीधा जुड़ाव

केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान से करीब 50 हजार लोगों को रोजगार मिल रहा है। पक्षियों की दुनिया को देखने के लिए यहां देश-विदेश से बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं। ऐसे में यहां रिक्शा चालक, होटल संचालक एवं गाइड को रोजगार मिलता है। अन्य लोग भी घना में आने वाले पर्यटकों के जरिए रोजगार पाते हैं। यदि पानी की कमी के चलते परिंदे यहां से रूठे तो बड़ी संख्या में लोगों के लिए रोजगार के लाले पड़ जाएंगे।

बिगड़ जाएगा प्राकृतिक तंत्र

घना पक्षी विहार यूं तो स्थानीय के साथ विदेशी खगों की खूबसूरत दुनिया के रूप में जाना जाता है। इसके अलावा यहां मछली, मेंढ़क, कछुआ सहित अन्य वन्य एवं जलीय जीव रहते हैं। यदि घना पानी के संकट से नहीं उबरा तो यहां प्राकृतिक संतुलन बिगडऩे का भी खतरा है। वजह, यहां आने वाले कई पक्षियों का भोजन मछलियां बनती हैं। पानी के अभाव में मछलियां जिंदा नहीं रहेंगी तो यहां पक्षियों के लिए भोजन और पानी दोनों ही नहीं मिल पाएंगे।

वर्ष 1985 में घना बना विश्व धरोहर

साल 198 2 में केन्द्र सरकार ने भरतपुर पक्षी अभयारण्य को राष्ट्रीय पार्क घोषित किया। इसके बाद यूनेस्को ने 198 5 में घना को विश्व धरोहर के खिताब से नवाजा। इसके बाद से यह पर्यटन क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्थल बन गया और हर साल यहां पर लाखों की संख्या में पर्यटक भ्रमण करने पहुंचने लगे। हालांकि साल 2005 के बाद जल संकट के चलते यहां समस्या हो रही है। इलाके में सूखे के चलते पांचना बांध से पानी बंद हो गया और इसके बाद सरकार ने चंबल जल परियोजना को घना को बचाने के लिए स्वीकृति दी और तय किया कि घना को हर साल चंबल परियोजना से तय पानी मिलेगा, जो अब भी बरकरार है।

अजान बांध से मिलता था पानी

उद्यान में किसी समय पानी की आपूर्ति गंभीर नदी से अजान बांध में होती थी। इस बंध से पानी घना में आता था। घना के लिए गंभीर नदी जीवनदायिनी थी, लेकिन करौली में पांचना बांध का निर्माण होने के बाद साल 2006 और 07 में पड़े सूखे पांचना बांध से नियमित पानी भरतपुर को मिलना बंद हो गया। घना को एक सीजन में करीब 550 एमसीएफटी पानी की जरूरत होती है। हालांकि चंबल लिफ्ट परियोजना से साल 2011 से नियमित पानी मिल रहा है, लेकिन वह सीमित है, जबकि चंबल लिफ्ट परियोजना से सीमित पानी केवल 6 3.5 एमसीएफटी ही प्रतिवर्ष घना को मिल सकता है। इस वजह से बारिश का पानी घना के लिए काफी अहम है। गोवर्धन कैनाल से पानी एनसीआर इलाके में बारिश होने पर ही मिलता है। गोवर्धन कैनाल से पहली दफा पानी वर्ष 2012-13 में 8 एमसीएफटी मिला था। वहीं घना से अक्टूबर 2011 में पानी घना में छोड़ा, जो फरवरी 2012 तक चला। तब पहली बार 297 एमसीएफटी पानी मिला था।

घना को कब-कब मिला पानी

- 25 जून
- 28 जून
- 1 जुलाई
- 22 जुलाई
- 29 अगस्त
- 4 सितम्बर

इनका कहना है

निश्चित रूप से घना लंबे समय से पानी की कमी से जूझ रहा है। यदि ऐसे ही हालात रहे तो यूनेस्को के साथ रामसर साइट से भी घना हट सकता है। यह बेहद चिंतनीय है। चम्बल से कुछ ही पानी मिल रहा है, जो पर्याप्त नहीं है। अभी घना को 550 एमसीएफटी पानी की जरूरत है, जो उसे नहीं मिल पा रहा है। घना की बाउंड्री के पास ई-ग्रेट ने अपनी कॉलोनी बसाई है। यह घना का ही पार्ट है। घना को अभी एक चौथाई पानी भी नहीं पा मिला है।

- अभिमन्यु सहारण, डीएफओ राष्ट्रीय केवलादेव घना पक्षी विहार भरतपुर