
जिन पत्रावलियों को निरस्त किया, उन्हीं के जारी हुए ज्यादातर फर्जी पट्टे
भरतपुर. नगर निगम के नाम से फर्जी पट्टा जारी करने का मामला अब स्वायत्त शासन विभाग तक जा पहुंचा है, लेकिन रसूख के दबाव में नगर निगम के जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होना आमजन के बीच बड़ा सवाल बना हुआ है। क्योंकि अभी तक जितने भी पट्टे जारी हुए हैं। इन सभी को मिलाकर जितनी भी राशि का घोटाला हुआ है, यह राशि किस-किस के पास पहुंची है। इस बात का खुलासा होना बाकी है। हालांकि जिला कलक्टर की ओर से गठित कमेटी ने भी जांच शुरू कर दी है। उल्लेखनीय है कि राजस्थान पत्रिका ने 29 जुलाई को सबसे पहले इस मामले का खुलासा किया था। अब इस मामले में नगर निगम के आयुक्त, मेयर ही नहीं बल्कि कोई भी जिम्मेदार बोलने से कतरा रहा है। ऐसे में जिम्मेदारों की चुप्पी भी जांच का विषय बनी हुई है। हालांकि फर्जी पट्टा प्रकरण को दबाने की कोशिश भी की जा रही है। क्योंकि अगर कोई पीडि़त नगर निगम में जाकर पट्टों के बारे में जानकारी करता है तो उसे कोई संतोषजनक जवाब तक नहीं मिल रहा है। इतना ही नहीं फर्जी पट्टा प्रकरण में जिम्मेदारी से बचने के लिए नगर निगम की ओर से अभी तक साधारण सभा की बैठक कराने का भी निर्णय नहीं लिया गया है। क्योंकि यह तय है कि इस बार होने वाली बैठक में फर्जी पट्टा प्रकरण पर नगर निगम को घेरा जाएगा। ऐसे में बैठक कराने से भी बचा जा रहा है।
सरकार ने दिए थे ऑनलाइन कार्य के आदेश
बताते हैं कि प्रशासन शहरों के संग अभियान के तहत राज्य सरकार की ओर से पट्टों से संबंधित कार्य ऑनलाइन कराने के आदेश दिए गए थे, लेकिन नगर निगम की ओर से संबंधित कंपनी को कार्य आदेश देने के बाद भी सरकार के आदेश की पालना तक नहीं की गई। फिर भी नगर निगम की ओर से अभी तक जिम्मेदारी मानने से इंकार किया जा रहा है। ऑनलाइन प्रक्रिया के तहत पट्टों से संबंधित कार्य, 90-ए, उपविभाजन/पुनर्गठन, नाम हस्तांतरण, भवन निर्माण स्वीकृति, लीज राशि, पट्टा रूपांतरण का कार्य कराया जाना था।
कमेटी ने मांगी सब रजिस्ट्रार से सूचना
जिला कलेक्टर की ओर से राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित फर्जी पट्टा प्रकरण की जांच के लिए गठित की गई कमेटी के अध्यक्ष एडीएम प्रशासन ने आठ सितंबर 2022 को सब रजिस्ट्रार को पत्र लिखकर पंजीकृत हुए पट्टों की सूची मांगी गई है। इधर, नगर निगम से भी जारी किए गए पट्टों की सूची मांगी है। बताते हैं कि अगर यह प्रक्रिया ऑनलाइन अपनाई जाती तो सब रजिस्ट्रार कार्यालय पंजीकृत करते समय हर पट्टे की पत्रावली का अवलोकन ऑनलाइन कर लेता, इससे फर्जी पट्टा बनाना मुश्किल हो सकता था।
यह सवाल खड़े कर रहे जांच का सवाल
1. फर्जी पट्टों पर जो पत्रांक नंबर है, क्या वह नगर निगम के डिस्पेच रजिस्टर से मेल खाते हैं। निगम के अंदर कई डिस्पेच रजिस्टर हैं। पट्टों के लिए अलग से रजिस्टर बना रखा है। आखिर इन फर्जी पट्टों को कहीं निगम के रजिस्टर से डिस्पेच तो नहीं किया गया, यह भी एक गहन जांच का विषय है।
2. फर्जी पट्टे जारी करने से पूर्व आम जनता से इन अभियानों में आवेदन मांगे गए। मौके की रिपोर्ट कनिष्ठ अभियंताओं से मंगाई गई। समाचार पत्रों में आपत्ति मांगी गई। न काबिल पत्रावलियों को निरस्त भी किया गया, लेकिन अखबार में आपत्ति जारी होने व कनिष्ठ अभियंता को मौके पर जाकर रिपोर्ट लाने से आम जनता में एक विश्वास कायम किया गया। जिन पत्रावलियों को निगम की ओर से निरस्त किया गया। उन्हीं पत्रावलियों के अधिकांश फर्जी पट्टे जारी हुए हैं। यह भी एक जांच का बिंदु है कि निरस्त पत्रावलियों की सूचना फर्जी पट्टे बनाने वाले गिरोह के पास कैसे पहुंची। इसके आधार पर फर्जी पट्टा बनाया गया।
3. नगर निगम कार्यालय से कई ऐसी पत्रावली है जो कि निरस्त होने के बाद निगम कार्यालय से गायब हैं। गायब पत्रावलियों को लेकर निगम प्रशासन की ओर से अभी तक कोई भी कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की गई। यह भी एक जांच का विषय है
4. फर्जी पट्टों के साथ शामिल भूखंड का साइड प्लान किस ड्राफ्टमैन की ओर से किसके आदेश पर तैयार कराया गया।
Published on:
13 Sept 2022 05:37 pm
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