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एक घंटे में डूबने वाला था शहर, खुद पूर्व महाराजा बृजेंद्र सिंह ने खोला मोरा

-स्मृति विशेष: पूर्व महाराजा सवाई स्व. बृजेंद्र सिंह की जयंती आज

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एक घंटे में डूबने वाला था शहर, खुद पूर्व महाराजा बृजेंद्र सिंह ने खोला मोरा

एक घंटे में डूबने वाला था शहर, खुद पूर्व महाराजा बृजेंद्र सिंह ने खोला मोरा

भरतपुर. आज भी शहर के बुजुर्ग उस बाढ़ को याद कर सिहर उठते हैं। जब वर्ष 1972 की भयंकर बाढ़ में चारों ओर त्राहि-त्राहि मची हुई थी। करीब एक-दो घंटे में जब भरतपुर शहर डूबने वाला था। कलक्टर और प्रशासनिक अधिकारी मायूस होकर नगरवासियों को भगवान भरोसे छोड़ चुके थे। पूर्व महाराजा ने अटलबंध का मोरा अपने हाथों से खोलते हुए शहर को बचाया था। हालांकि बदलते समय के अनुसार अब यह मोरा हो या शहर के जलनिकासी की प्राचीन व्यवस्था, यह सब अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुके हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार रामवीर सिंह वर्मा बताते हैं कि भरतपुर राजवंश के 13वें नरेश पूर्व महाराजा सवाई बृजेंद्र सिंह का जन्म एक दिसंबर 1918 ई. को हुआ था। उनके पिता पूर्व महाराजा कृष्ण सिंह देशभक्त एवं प्रजापालक शासक थे। पूर्व महाराजा बृजेंद्र जैसा धर्म-परायण, सह्रदय, निर्लोभी, सत्यवक्ता एवं दानवीर व्यक्तित्व के धनी थे। शिक्षा के प्रति उनका बेहद लगाव था। उनके संरक्षण में पढ़े अनेकों लोग भारतीय प्रशासनिक सेवा, विदेश सेवा, सेना एवं पुलिस सेवा के उच्चतम पदों पर रहे हैं। इनमें पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह, राजेंद्र शेखर, घासीराम, कर्नल भरत सिंह, कर्नल हुकम सिंह, केशवदेव शर्मा प्रमुख हैं। वे सभी समाजों की सरदारी को अपने निवास मोती महल पर बुलाकर भरतपुर के विकास की योजनाएं बनवाते थे। भरतपुर की सिंचाई, पैदावार, रीति-रिवाज एवं कानून व्यवस्था का जितना व्यवहारिक अनुभव एवं समस्या निराकरण की क्षमता उनमें थी, शायद ही किसी में रही हो। यही कारण था कि जब भी भरतपुर, आगरा, मथुरा, अलीगढ़, मेवात या धौलपुर में प्रशासनिक या सामाजिक समस्याएं आईं, उनमें सरकारी अधिकारी एवं नेता उनसे परामर्श लेते थे। भारत-चीन युद्ध के समय उन्होंने देश के सुरक्षा-कोष में सर्वाधिक स्वर्ण देकर कीर्तिमान स्थापित किया था। अपनी रियासत को भारत गणराज्य में 27 फरवरी 1948 को विलय पत्र पर हस्ताक्षर करते समय उनके खजाने में 80 लाख रुपए थे, जो उन्होंने स्वतंत्र भारत के खजाने में सौंप दिए।

प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को दी थी चांदी की बग्घी

बहुत कम लोगों को यह जानकारी होगा कि जिस चार घोड़ों वाली चांदी की बग्घी में बृजेंद्र सिंह दशहरा के अवसर पर निकलते थे। वह उन्होंने देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भेंट में दे दी। इसमें बैठकर बहुत दिन तक राष्ट्रपति गणतंत्र दिवस पर निकलते थे। पूर्व महाराजा ने अपने शासनकाल में रियासत के उन जरुरतमंद किसानों को विशेष कानून बनाकर उन पर लदे कर्ज से मुक्ति दिलाई, जिनकी जमीन कर्ज की एवज में गिरवी पड़ी थी। उन्होंने बृज जया प्रतिनिधि सभा की स्थापना कर प्रजातांत्रिक सोच का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया। छुआछूत प्रथा का उन्मूलन के लिए न केवल वाल्मीकि समाज को गंगा मंदिर में प्रवेश दिलाया, बल्कि मंदिर में ही उनके साथ सामूहिक भोज का आयोजन किया, जो कि समानता की सबसे बड़ी मिसाल है।

लोकसभा में बाबू राजबहादुर का दिया था साथ

वरिष्ठ साहित्यकार वर्मा बताते हैं कि भरतपुर के विकास की अवधारणा को ध्यान में रखते हुए सगे भाई के विरोध में वर्ष 1957 में लोकसभा चुनाव में बाबू राजबहादुर को जिताकर तरक्की का मार्ग प्रशस्त किया। उनकी सलाह के बाद सिमको वैगन फैक्ट्री का 1958 में घनश्यामदास बिड़ला की उपस्थिति में लालबहादुर शास्त्री रेलमंत्री के माध्यम से किया गया। कंजौली लाइन स्थित एम्युनिशन डिपो का निर्माण और बड़ा डाकघर का निर्माण भी उनकी योजना के अंग थे। उनका निधन आठ जुलाई 1995 को हुआ।