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जिंदगी के साथ नहीं, बाद भी मिलें दुआ, इसी हसरत ने बना दिया बेटियों की मांसी

- किन्नर नीतू मौंसी बोलीं, वंश और वारिस नहीं, अब यही कर्म मेरे साथ

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जिंदगी के साथ नहीं, बाद भी मिलें दुआ, इसी हसरत ने बना दिया बेटियों की मांसी

जिंदगी के साथ नहीं, बाद भी मिलें दुआ, इसी हसरत ने बना दिया बेटियों की मांसी

भरतपुर . मां की कोख से जन्म लेते ही हर बच्चे के आंचल से खुशियां बंध जाती हैं, लेकिन हमारे हिस्से लानत के सिवाय कुछ न था। जन्म के समय ही तकलीफ जैसे हमारे पल्लू से बंध गई थी। न देने वाली ने अपनाया और न किसी का साया नसीब हो सका। जिंदगी में न तो अपनत्व मिला और न परायापन। वजह, प्रकृति ने हमसे सब कुछ छीनकर ही भेजा। ऐसे में न जन्म ने खुशियां दीं और न मौत ने मातम। जिंदगी मानो खुद के ऊपर बोझ ही थी। ऐसे में जिंदगी के साथ और जिंदगी के बाद भी दुआओं में याद रह सकूं। इसके लिए गरीब बेटियों का विवाह करने की ठानी। इस सोच ने मुझे कब जगत की नीतू मौंसी बना दिया। इसका मुझे खुद इल्म तक नहीं हो सका। यह कहना है किन्नर नीतू मौंसी का।
नीतू मौंसी ने कहा कि हमारी खुद की दुनिया सबसे जुदा है। मेरी हमेशा से ही आरजू रही कि मेरी मौत के बाद भी अन्य किन्नरों की आंखों में भी लोग मेरी छवि देखें। यह मेरी जिंदगी के लिए सबसे बड़ा तोहफा होगा। वजह, किन्नरों की दुनिया में ऐसा कुछ नहीं होता कि लोग उन्हें जिंदगी के साथ और जिंदगी के बाद याद रखें। इसी लालसा को लेकर मैंने गरीब बेटियों के हाथ पीले करने की ठानी। अब शुक्रवार को नीतू मौंसी की ओर से 11वां विवाह सम्मेलन कराया जा रहा है। इसमें १० बेटियों का विवाह कराया जाएगा। वह कहती हैं कि गरीब बेटियों की मदद मुझे आत्म संतोष देती है। इस खुशी के आगे दुनिया की सारी धन-दौलत बेकार नजर आती है। वह कहती हैं कि यदि हम बाल-बच्चेदार होते तो दौलत के लिए संतानें आपस में खींचतान करतीं। किन्नरों की दुनिया को लोग अच्छी नजर से नहीं देखती। ऐसे में मेरी सोच रही कि कुछ ऐसा किया जाए कि इनकी दुनिया को भी लोग अच्छी नजरों से देखें। नीतू मौंसी ने कहा कि अगले जन्म में भले ही ईश्वर मुझे किन्नर बना दे, लेकिन मेरे अंदर दूसरों की मदद का भाव भी साथ ही पैदा करे, जिससे मैं दुनिया की उसी भावना के साथ मदद कर सकूं। नीतू मौंसी हर साल खुद मां बनकर बेटियों की शादी में कन्यादान करती हैं।

राजनीति नहीं आई रास, चुना धर्म का मार्ग

नीतू मौंसी ने एक बार राजनीति की डगर भी पकड़ी, लेकिन उन्हें ये रास नहीं आई। एक बार पार्षद बनने के बाद उन्होंने दुबारा इस ओर रुख ही नहीं किया। मौंसी कहती हैं कि मुझे राजनीति कतई समझ में नहीं आती। ऐसे में मैंने उसे अलविदा कह दिया। इसके उलट मुझे धर्म का मार्ग बहुत अच्छा लगा। मैंने पहली बार जब गरीब बेटियों की शादी का फैसला किया तो मुझे नहीं पता था कि मेरे पास कितने रुपए हैं, लेकिन मन में अटल विश्वास था कि यह सब हो पाएगा। इसके बाद अनवरत रूप से १० साल से यह सिलसिला हर साल चल रहा है, जो कोरोना में भी नहीं रुका।