
कांग्रेस में आंतरिक कलह....भाजपा में भी घमासान
भरतपुर . सियासी संकट के बीच कांग्रेस भले ही सत्ता को साधने में कामयाब हो गई हो, लेकिन अंदरखाने चल रही खींचतान ने संगठन को बिखेर दिया है। यही वजह है कि जिले की कांग्रेस सत्ता के मामले में तो सूबे में अव्वल हो गई, लेकिन संगठन में सबसे पिछले पायदान पर नजर आती है। वहीं इसके उलट भाजपा में सत्ता की चाह दूरियां को जन्म दे रही है। जिलाध्यक्ष के नाम की चर्चा के साथ ही यह कुनबा भी बिखरा-बिखरा नजर आ रहा है। सूत्रों की मानें तो भाजपा में तीन गुट जिलाध्यक्ष की दौड़ में एक-दूसरे से होड़ पाल बैठे हैं।
कांग्रेस की बात करें तो जिले की सातों सीट कांग्रेस के खाते में हैं। इनमें से दो विधायक केबिनेट मंत्री, दो विधायक राज्यमंत्री एवं दो विधायक (बसपा से कांग्रेस में शामिल) राज्यमंत्री दर्जाप्राप्त हैं। सत्ता में तो कांग्रेस का पलड़ा भारी तो हो गया, लेकिन संगठन की बात करें तो कांग्रेस कहीं भी संगठित नजर नहीं आती। जिलाध्यक्ष से लेकर अन्य पदों पर भी कोई व्यक्ति आसीन नहीं है। आलम यह है कि करीब तीन साल से ज्यादा के समय में कांग्रेस अपना जिलाध्यक्ष तक नहीं बना सकी है। यही वजह है कि कांग्रेस में अंदरखाने हर बार विरोध के स्वर मुखर होते नजर आ रहे हैं। कांग्रेस के समर्थन से जीते एक विधायक को राज्यमंत्री तो बना दिया, लेकिन यदा-कदा कांग्रेसी इसको लेकर भी विरोध जताते हैं, उन्हें तवज्जो नहीं मिलकर दूसरे दल के कार्यकर्ताओं के काम कांग्रेस से अधिक होते हैं। यह विरोध का नतीजा ही है कि संगठन में नियुक्ति अभी तक नहीं हो सकीं। प्रदेश स्तर पर भी कांग्रेस दो धड़ों में बंटी है। यह किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में संगठन अभी पंगु ही बना हुआ है।
कांग्रेस में इनकी नहीं हुई घोषणा
- यूआईटी चेयरमैन
- कांग्रेस जिलाध्यक्ष
- ब्लॉक अध्यक्ष
रायशुमारी भी नहीं कर सकी कुलीनों को एक
भाजपा भले ही एकजुट और शांत नजर आ रही हो, लेकिन जिलाध्यक्ष की दौड़ ने इन कुनबे को भी अलग-थलग सा कर दिया है। जिलाध्यक्ष की दौड़ ने अपनों के बीच ही होड़ बढ़ा दी है। वजह, विधानसभा चुनाव से पहले संभाग में सभी जिलाध्यक्ष बदल जाने हैं। इसकी खास वजह यह बताई जा रही है कि जो व्यक्ति चुनाव लड़ेंगे, वह जिलाध्यक्ष की दौड़ से बाहर होंगे। संभाग के भरतपुर, धौलपुर, करौली एवं सवाईमाधोपुर में जिलाध्यक्ष बदलना तय माना जा रहा है। इसमें कुछ जगह जिलाध्यक्ष बदलने का कारण निष्क्रियता भी बताया जा रहा है। भाजपा ने संगठनों को एकजुट रखने को हाल ही में सर्वे टीम भी भेजी थी। इसमें प्रमुख लोगों से रायशुमारी भी की गई। इसमें सामने आया कि वर्तमान जिलाध्यक्ष शैलेन्द्र सिंह को रिपीट किया जाए। वहीं ऋषि बंसल, गिरधारी गुप्ता, बृजेश अग्रवाल, भानूप्रताप सिंह, धर्म सिंह चौधरी एवं अरविंद पाल सिंह के नाम पर भी खूब चर्चा हुई। हालांकि इसमें संघ के जुड़े एक व्यक्ति का नाम प्रमुख रूप से उभर कर सामने आया और करीब-करीब इस पर सहमति भी बनी। इस सहमति के बाद दूसरा गुट सक्रिय हो गया और प्रदेश की राजधानी में अपनी गोटी बिठाने लगा। इसमें वर्तमान को कुछ माह तक यथावत रखने या दूसरे व्यक्ति को कार्यवाहक के रूप में जिम्मेदारी देने की बात रखी। विरोध और स्वीकृति के बीच जिलाध्यक्ष की घोषणा होते-होते रह गई। इस पर अब दोबारा से मंथन शुरू हुआ है। हालांकि उम्मीद जताई जा रही है कि चार-पांच दिन में जिलाध्यक्ष का फैसला प्रदेश स्तर से हो सकता है। हालांकि एबीवीपी और संघ के जुड़े व्यक्ति के पक्ष में पूर्व कद्दावर नेता नजर आ रहे हैं।
नई नियुक्तियों पर भी हुई फजीहत
हाल ही में जिलाध्यक्ष की ओर से तीन उपाध्यक्ष एवं एक जिला मंत्री की घोषणा की गई। जानकार बताते हैं जिले में नियमानुसार 8 जिला उपाध्यक्ष ही हो सकते हैं। तीन और बनने के बाद इनकी संख्या 9 तक पहुंच गई। ऐसे में एक किसे हटाया इसकी जानकारी नहीं दी गई। ऐसे में इसको लेकर अंदर खाने विरोध के स्वर मुखर हुए। कुछ कार्यकर्ताओं ने बताया कि नियुक्ति के मामले में जिला कोर कमेटी नाम तय करती है। इसके बाद यह संभाग प्रभारी एवं जिला प्रभारी तक पहुंचती है। इसके बाद प्रदेश अध्यक्ष स्तर से इनकी घोषणा होती है, लेकिन यहां ऐसा नहीं होना बताया गया है।
Published on:
21 Nov 2022 11:34 am
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