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सुजानगंगा नहर: पानी का बदला रंग, गर्मी तेज होते ही काई मार सकती है सड़ांध

-नवंबर माह में हुई थी इतिहास में पहली बार लाखों मछलियों की मौत, अब भी बहुत कम संख्या में रह गए हैं नहर में जलीय जीव

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सुजानगंगा नहर: पानी का बदला रंग, गर्मी तेज होते ही काई मार सकती है सड़ांध

सुजानगंगा नहर: पानी का बदला रंग, गर्मी तेज होते ही काई मार सकती है सड़ांध

भरतपुर. ऐतिहासिक सुजानगंगा नहर में अब दुबारा से पानी का रंग बदल गया है। अब पानी हरा रंग का हो चुका है, जो कि पूरी तरह से प्रदूषित नजर आ रहा है। चूंकि नवंबर माह में ही करीब 15 दिन के अंतराल में इतिहास में पहली बार सुजानगंगा नहर में लाखों मछलियों की मौत हुई थी। अब आशंका है कि अगर इसे समय पर नहीं देखा गया तो आगामी समय में जैसे ही गर्मी बढ़ेगी तो काई में सडऩ पैदा होगी। इससे बदबू फैलने की संभावना भी बनी हुई है। जानकारी के अनुसार नवंबर 2020 में लाखों मछलियों की मौत के बाद सुजानगंगा नहर के पानी की जांच कराई गई थी। इसमें डीओ का स्तर बहुत कम पाया गया था। उस समय नहर के पानी का रंग काला हो गया था। अब पिछले कुछ समय किला परिसर के मुख्य द्वार के आसपास के पानी का रंग हरा हो रहा है। एक्सपर्ट का कहना है कि यह प्रदूषण की देन है कि पानी का रंग दुबारा से बदल रहा है। चूंकि सुजानगंगा नहर में अब भी गंदे पानी की आवक कम नहीं हुई है। साथ ही बारिश के कारण मिट्टी बहकर अंदर जा रही है। जो कि जलीय तंत्र को प्रभावित करने के साथ ही पानी को प्रदूषित कर रही है।

सुजान गंगा में जगह-जगह से टूटी है मोटवॉल

नहर की मोटवॉल कई जगह से टूटी है। इसमें चौबुर्जा, धोबीघाट, गोपालगढ़, सफेद कोठी के सामने, केतन गेट, पाई बाग और खिरनी घाट प्रमुख हैं। जबकि 35 से ज्यादा स्थानों पर मोटवॉल की तत्काल मरम्मत कराए जाने की जरुरत है। एएसआई के अधीन आने वाले पुरातात्विक महत्व के स्मारकों के एक सौ मीटर की परिधि में कोई निर्माण या सुधार कार्य नहीं कराए जा सकते। नियमों में यह भी प्रावधान है कि दो सौ मीटर की दूरी पर भी काम कराने के लिए एएसआई से अनुमति लेनी होगी। कुछ वर्ष पहले एएसआई ने सुधार के लिए सैद्धांतिक सहमति दे दी, लेकिन काम अब तक नहीं हो सका है।

आठ साल बनकर तैयार हुई थी ऐतिहासिक सुजानगंगा नहर

1743 से 1751 के बीच राजा सूरजमल ने भरतपुर में किले का निर्माण करवाया। कुछ का मानना है कि गहराई का कोई पता नहीं, वही कुछ लोग कहते है कि 10 से अधिक हाथियों की लंबाई के बराबर है। नहर में पानी के भरने और गंदे पानी के निकास के लिए जमीन के अंदर से व्यवस्थाएं थी। शहर से 10 किलोमीटर दूर स्थित अजान बांध के पानी से नहर को भरा जाता था। आज दोनों ही व्यवस्था पूरी तरह से चौपट हो गई है। इसके साथ ही शहर भर की गंदगी अब नहर के हवाले की जाने लग गई है। इस गंदगी को रोकने के लिए तीन करोड़ की लागत से एक नाला भी चारों ओर बनाया जा चुका है जो पूरी तरह से बेकार पड़ा हुआ है। किले की सुरक्षा के लिए 1733 ईस्वी में सुजान गंगा नहर का निर्माण शुरू हुआ था। यह आठ साल में बनकर तैयार हुई। इसमें 650 कारीगरों ने रात-दिन काम किया। नहर 2.4 वर्ग किलोमीटर में फैले किले के चारों ओर करीब 2.9 किलोमीटर लंबी है। यह करीब 200-250 फुट चौड़ी और करीब 30 फुट गहरी है। किले की दीवार को फोर्ट वॉल और दूसरी दीवार को मोट वॉल कहा जाता है।

हर बनाते रहे स्कीम, लेकिन धरातल पर नहीं आया नजर

वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीनाथ शर्मा ने बताया कि वह वर्ष 1985 से सुजानगंगा नहर के संरक्षण की लड़ाई लड़ रहे हैं। 1996 में हाइकोर्ट में रिट दायर की गई थी। उस समय शहर की जनता ने काफी आंदोलन किया था। खुद उस समय के विधायक स्व. आरपी शर्मा ने भी विधानसभा में तीन बार मुद्दा उठाया था। हालांकि राज्य सरकार की ओर से इस प्रकरण में हर बार लापरवाही की जाती रही है। वर्ष 2003 से लेकर अब तक करीब चार से छह बार हाइकोर्ट की ओर से सुजानगंगा नहर को प्रदूषित होने से बचाने के आदेश दिए जा चुके हैं। हाइकोर्ट के आदेश के बाद सुजानगंगा नहर के चारों ओर एक नाला बनाया गया था, इस पर करीब चार करोड़ रुपए व्यय हुए थे। इंजीनियरों ने नाले को भी सुजानगंगा नहर के लेवल से डेढ़ मीटर ऊपर बना दिया। हाइकोर्ट ने सात इंजीनियर को दोषी मानते हुए रिकवरी के आदेश दिए। तनख्वाह में से राशि जमा होना शुरू हो गई। फिर तय हुआ कि कौन कितना दोषी है। सरकार ने जांच कराई तो 16 सीसीए की जांच को 17 सीसीए में कर दिया। हाइकोर्ट ने दुबारा जांच की। आज तक कोई जांच नहीं हुई है। तीन करोड़ रुपए बर्बाद हुआ। तोडऩे में अलग व्यय हुआ। नगर निगम ने यह राशि आरएसआरडीसी को दी थी। इसके बाद सुजानगंगा नहर का पानी निकालने पर लाखों रुपए खर्च किए गए। तुलाई कर मिट्टी निकाली गई। वो भी काम बंद हो गया। मिट्टी व गंदा पानी जमा पड़ा है। इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से कहा कि बजट दिया जाए। एक-एक, दो-दो करोड़ रुपए आए। काम अधूरा ही रहा। कुछ स्थानों से मोटवॉल और गिर गई। किले की दीवार भी गिर गई। सरकार ने हाइकोर्ट में प्रोजेक्ट पेश कर रखा है। इसे तीन चरणों में किया जाना है। सफाई करना व पानी भरना। फ्लोटिंग वगैराह चलाना। एक वर्ष में पूरा करने का आश्वासन दिया था।


-हरा पानी हो गया है। पहले काला हुआ। किले के मुख्य दरवाजे के आसपास में पानी का रंग बदला है। दोनों किनारे पर एक तरफ कचरा है और दूसरी ओर बारिश के कारण मिट्टी ढहकर अंदर चली गई है। काई के कारण पानी का रंग बदला है। बदबू फैलने की आशंका है। आगामी माह में गर्मियों के मौसम में इस पर प्रभाव पडऩा तय है। कार्बनडाइ ऑक्साइड, मिथेन, डीओटी कम हो गई है। जहरीली गैस बनने के कारण परेशानी आ रही है। एक बार बंध बारेठा में भी इस तरह की परेशानी आई थी। समाधान यह हैकि आउटलेट-इनलेट खोले जाएं। ताकि अच्छा पानी लाया जा सके। खराब पानी को बाहर निकाला जा सके। हार्वेस्टिंग की जाए। कचरा भी साफ कराया जाए। पहले भी प्रयास किया जा चुका है। गंदा पानी फिर भी नहर में जा रहा है।

विनोद डंडोतिया
सेवानिवृत मतस्य अधिकारी