
सात साल पहले सात समंदर पार से आईं, अब कान्हा की बनकर रह गईं रूसी मां-बेटी
भरतपुर/डीग . प्रेम, कर्म और योग के संदेश को सहज समझाने वाले भगवान कृष्ण के दीवानों की कहीं कमी नहीं है। इनके लिए सरहदें कोई मायने नहीं रखतीं। चाह है तो बस कान्हा को पा लेने की। उनके भक्ति भाव में डूब जाने की। सात साल पहले रूस से भारत आई मां-बेटी को श्रीराधाकृष्ण की भक्ति ऐसी भायी कि दोनों ब्रज भूमि में कृष्ण भक्ति रसिक महावीर भगत के साथ अध्यात्म शक्ति की खोज में जुट गईं।
गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि ‘जिसकी भक्ति पिछले जन्म में अधूरी रह जाती है, वह दुबारा जन्म लेकर स्वत: ही भक्ति करने लगता है।’ ऐसे ही एक भक्त हैं रसिक महावीर भगत। गोवर्धन के सप्तकोसीय राजस्थान के पूंछरी परिक्रमा मार्ग में इन दिनों विदेशी मां-बेटी रसिक महावीर भगत के साथ भगवान कृष्ण की भक्ति में लीन दिख रही हैं। गिरिराज की परिक्रमा देने आ रहे परिक्रमार्थियों को यह एक अनोखे और अलौकिक अंदाज में मंत्रमुग्ध कर रहे हैं। सोशल मीडिया में लोग उन्हें काफी पसंद कर रहे हैं। यू-ट्यूब पर इनके लाखों फॉलोअर हैं।
भक्ति से हर किसी को कर रही हैं मंत्रमुग्ध
मार्च 2016 में श्रीराधा-कृष्ण की लीलाओं से प्रभावित होकर रूस से अपनी बेटी के साथ वृंदावन आई रूसी महिला एलेना इवोनोवा ने इस्कॉन से जुडकऱ अपना नाम प्रेमाग्नि देवी दासी रख लिया। उनके साथ ही बेटी अन्ना इवोनोवा का नाम गौरी कुमारी देवी दासी हो गया। तब से दोनों कृष्ण प्रेम में गीत गा रही हैं। सोशल मीडिया पर जब इन्होंने राजस्थान के पूंछरी परिक्रमा मार्ग में अप्सरा कुंड और गोविन्द कुंड के बीच कच्ची परिक्रमा मार्ग में कृष्ण भक्त रसिक महावीर भगत को भजन गाते सुना तो दोनों रसिक के भजनों से ऐसी प्रभावित हुईं कि नबंवर 2022 से लगातार दोनों मां-बेटी वृंदावन से पूंछरी आकर रसिक महावीर के साथ कृष्ण भक्ति में भजनों से हर किसी को मंत्रमुग्ध कर रही हैं। जब रसिक महावीर ढपली की थाप पर भजन सुनाते हैं तो दोनों मां-बेटी बंशी और मजीरा बजाकर रसिक महावीर का साथ देती हैं। पत्रिका संवाददाता ने जब उनसे बात की तो उन्होंने कहा कि वे कृष्ण को पाना नहीं चाहती, बल्कि उनका होना चाहती हैं। प्रेम ही भक्ति का वह मार्ग है, जो कृष्ण के करीब हमें ले जाता है।
मृदंग-पखावज जैसे वाद्य यंत्रों को बजाने में माहिर हैं महावीर
डीग के पूंछरी निवासी रसिक महावीर भगत को बचपन से ही संगीत का शौक रहा है। वह हारमोनियम, ढोलक, ढपली, मृदंग, बांसुरी एवं पखावज जैसे वाद्य यंत्रों को बजाने में माहिर हैं। उससे निकलने वाली आवाज पर हर कोई ठहर सा जाता है। 5-10, 20-30 एवं 40 से 60 मिनटों के करीब 200 भजन उन्हें कंठस्थ हैं। परिक्रमा मार्ग पूंछरी में अधिकतर बदलते भजनों को हजारों श्रद्धालु उनके पास बैठकर सुन रहे हैं।
Published on:
27 Apr 2023 05:51 pm
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