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टेबल पर सर्जरी, दवा के नाम पर सिर्फ दुआ

-जिले से पशुपालन मंत्री रहने के बाद भी नहीं सुधरे पशु चिकित्सालय के हाल-पड़ोसी जिले मथुरा में पहुंचते हैं पशुपालक

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टेबल पर सर्जरी, दवा के नाम पर सिर्फ दुआ

टेबल पर सर्जरी, दवा के नाम पर सिर्फ दुआ

भरतपुर . गंभीर बीमारी से जूझते मूक पशुओं की पीर यहां पर्वती सरीखी नजर आती है। वजह, न तो यहां पशुओं के लिए पर्याप्त दवाओं का इंतजाम है और न ही ऑपरेशन करने के लिए पर्याप्त संसाधन। ऐसे में संभाग के रामजीलाल गुप्ता राजकीय बहुउद्देशीय पशु चिकित्सालय पहुंचने वाले पशुपालकों को खासी दिक्कतें हो रही हैं। भरतपुर से पशुपालन मंत्री भी रहे चुके हैं, फिर भी चिकित्सालय के हालात नहीं बदले हैं।
पशु चिकित्सालय में 60 से 70 बीमार पशुओं की ओपीडी रहती है। इनके लिए यहां दवाओं का टोटा बना हुआ है। खास बात यह है कि गंभीर बीमार पशुओं की बेहतरी के लिए यहां ऑपरेशन जैसी सुविधाएं सिर्फ कामचलाऊ हैं। यहां पशुओं की सर्जरी महज टेबल पर की जाती है। इसके लिए अलग से थियेटर जैसी सुविधाएं नहीं हैं। सूत्रों ने बताया कि ऑपरेशन के लिए पर्याप्त संसाधन भी उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में सर्जरी करने वाले चिकित्सकों को खासी परेशानी होती है। कई बार कहने के बाद भी व्यवस्थाओं में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। ऐसे में यहां पहुंचने वाले पशुपालक सरकार को कोसते नजर आते हैं। आलम यह है कि यदि कोई पशु गंभीर रूप से बीमार हो जाए तो विशेष परिस्थतियों में चिकित्सकों के पास उसे उच्च चिकित्सालय को रैफर करने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। ऐसे में पशुपालक अपने पशुओं को नजदीकी जिले मथुरा या आगरा उपचार के लिए ले जाते हैं। इसके चलते पशुपालकों को आर्थिक एवं मानसिक रूप से परेशान होना पड़ता है।

जानिए पशु और पशुपालकों की पीड़ा

1. उफ दवा... ऊंट के मुंह में जीरा

कहने को भरतपुर स्थित पशु चिकित्सालय संभाग का सबसे बड़ा अस्पताल है, लेकिन सुविधाओं का टोटा इसे छोटे अस्पतालों की श्रेणी की ओर से धकेलता प्रतीत हो रहा है। पहले पशुओं के लिए अस्पताल से करीब 122 दवाएं मिलती थीं, जो अब सिमटकर महज 20 से 22 प्रकार की रह गई हैं। यह दवा भी अस्पताल को बेहद कम मात्रा में मिल रही हैं। स्टॉक कम आने के कारण एक बार की डिमांड में महज 8 से 10 दिन ही काम चल पाता है। ऐसे में पशुपालकों को महंंगे दामों पर बाजार से दवा खरीदनी पड़ती हैं।

2. भवन के हाल भी खराब

पशुओं का उपचार करने के लिए बने भवन के भी हाल खराब हैं। इस संबंध में कई मर्तबा पशु चिकित्सक एवं अधिकारियों ने उच्चाधिकारियों को पत्र लिखा है, लेकिन इसके बाद भी व्यवस्थाओं में खास सुधार नहीं हो सका है। सूत्रों ने बताया कि बिल्डिंग में बिजली के तार भी यहां-वहां बिखरे पड़े हैं। इसके अलावा बारिश के मौसम में भवन में नमी है। ऐसे में यहां करंट का खतरा लगातार बना हुआ है। अधिकारियों के कहने के बाद भी न तो इसके लिए बजट मिला है और न ही अन्य कोई सुधार किया है। ऐसे में पशुपालकों को परेशान होना पड़ रहा है।

3. चिकित्सक भी नहीं पूरे

संभाग मुख्यालय के जिले में बने पशु चिकित्सलय में पशु चिकित्सकों का भी कमी महसूस की जाती है। चिकित्सालय की स्थापना के समय से भी यहां स्वीकृत पदों के अनुरूप चिकित्सक लगाए जा रहे हैं, जबकि पशु धन की संख्या बढऩे के कारण यहां चिकित्सकों की कमी साफ महसूस की जा रही है। खास बात यह है कि अन्य संभाग स्तर के जिलों में चार-चार चिकित्सालय स्थापित हैं, लेकिन भरतपुर में एक ही चिकित्सालय है। ऐसे में यहां दूरदराज के पशु उपचार के लिए पहुंचते हैं, जिन्हें पर्याप्त सुविधा नहीं मिल पाती।

इनका कहना है

हमारे पास मेडिसिन आ चुकी है। कुछ दवाएं पहले लॉकडाउन की वजह से अटक गई थीं। अब हम सभी जगह सप्लाई कर रहे हैं। सभी केन्द्रों पर 15 दिन में दवाएं पहुंच जाएंगी। ऑपरेशन थियेटर हमारे यहां नहीं है। इसके लिए पत्र व्यवहार किया है। थियेटर के रजिस्ट्रेशन का काम प्रोसिस में है। कोशिश है कि थियेटर की जल्द स्थापना हो।

- नगेश कुमार, संयुक्त निदेशक पशुपालन विभाग भरतपुर