पैर कटने के डर से छोड़ा अस्पताल, गहने गिरवी रख निजी अस्पताल में कराया ऑपरेशन

-घर पहुंचने लायक भी नहीं बचे पैसे, इलाज पर भारी लापरवाही

By: Meghshyam Parashar

Updated: 20 Nov 2020, 01:20 PM IST

भरतपुर. सुनीता की 'सिसकियों पर संक्रमण का संकट बताकर अस्पताल प्रशासन भले ही सरकार को सफाई पेश कर दे, लेकिन सुनीता के घावों ने अस्पताल की चादर को और मैला कर दिया है। आरबीएम में बदइंतजामी का शिकार हुई सुनीता ने अपने गहने गिरवी रखकर निजी अस्पताल में टूटे पैर का ऑपरेशन कराया है। खास बात यह है कि अस्पताल में सुनवाई नहीं होने और पैर कटने के डर से सुनीता अस्पताल छोडऩे को विवश हुई। महिला की पीड़ा संबंधी खबर पत्रिका ने प्रमुखता से प्रकाशित की। पत्रिका ने 18 नवम्बर के अंक में 'शर्मनाक प्लास्टर चढ़ा कर कह दिया बाहर कराओ ऑपरेशन शीर्षक से खबर प्रकाशित की। इसके बाद अस्पताल प्रशासन हरकत में आया और पीडि़ता महिला की सुनीता की खोज-खबर ली, लेकिन उसका कहीं पता नहीं चला, लेकिन पत्रिका ने तलाश कर महिला से बात की।
करीब छह दिन पूर्व खेरली के पास सड़क हादसे में सुनीता को पैर में गंभीर चोट लगी। वह उपचार कराने आरबीएम अस्पताल आई, लेकिन उसे यहां उपचार के दौरान बदइंतजामी की पीर सहनी पड़ी। पत्रिका की पहल पर उसे फिर से वार्ड में तो भर्ती कर लिया गया, लेकिन इलाज उस तक नहीं पहुंच सका। उपचार नहीं मिलने और असहनीय होते दर्द के बीच उसने अस्पताल छोडऩे का फैसला किया। सुनीता बताती है कि उसे अपने पैर में पस पडऩे जैसा एहसास हो रहा था, लेकिन चिकित्सक उसका ऑपरेशन करने के बजाय समय बढ़ाते ही जा रहे थे। ऐसे में प्लास्टर चढ़े पैर की पीर बढ़ती ही जा रही थी। आखिर में सुनवाई नहीं होने और आरबीएम अस्पताल में पैर कटने के डर के चलते वह अस्पताल छोड़ गई और जघीना गेट के पास स्थित एक निजी अस्पताल में टूटे पैर का ऑपरेशन कराया। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद सुनीता को अपने घर जाना था, लेकिन किराये की गाड़ी वाले ने उससे खेरली जाने के लिए 1500 रुपए की मांग की, जो उसके पास नहीं थे। अब चिकित्सक ने छह दिन बाद उसे फिर से अस्पताल बुलाया है। ऐसे में वह सेवर-लुधावई टोल के पास ओम सिटी के पास से कबाडऩुमा कमरे में किसी परिचित के यहां रही है। इसका भी किराया करीब 300 रुपए तय किया गया है।

सुनीता का आरोप मांगे 10 हजार

पीडि़त सुनीता का आरोप है कि आरबीएम अस्पताल में उससे पैर के ऑपरेशन के लिए दस हजार रुपए मांगे। साथ ही यह डर भी बताया गया कि उसका पैर काटना पड़ सकता है। हालांकि यह बातें अस्पताल प्रशासन की ओर से न कहकर किसी अन्य व्यक्ति ने कही थी। इसके चलते सुनीता बेहद डर गई और उसने कर्ज लेकर भी अपना उपचार निजी अस्पताल में कराना बेहतर समझा। सुनीता ने बताया कि निजी अस्पताल में उसके पैर का ऑपरेशन 22 हजार रुपए में हुआ है। साथ ही करीब पांच हजार रुपए उसने ब्लड के दिए। छुट्टी होने के दौरान निजी अस्पताल की ओर से 2100 रुपए की दवा का पर्चा दिया गया। सुनीता ने बताया कि इस रकम का इंतजाम उसने अपने भांजे को गहने गिरवी रखकर किया है। उसने बताया कि उसने अपनी चांदी की सांठ (पैरों में पहनने वाली), पायजेब एवं कौंधनी करीब 25 हजार रुपए में गिरवी रखीं। इसके बाद उसका उपचार हुआ।

अब अस्पताल प्रशासन डाल रहा लापरवाही पर पर्दा

पीडि़ता सुनीता की कराह की अनसुनी करने वाला अस्पताल प्रशासन अब सरकार की तिरछी नजर से खुद को बचाने की फिराक में है। तीन दिन में ही अस्पताल प्रशासन ने खुद ही मामले की जांच कर क्लीन चिट ले ली है। अस्पताल प्रशासन की जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि मरीज के बाएं पैर में कम्पाउंड फ्रेक्चर था। साथ ही जांघ पर बड़ा घाव था। सड़क दुर्घटना का मामला होने के कारण घावों पर मिट्टी लगी थी। ऐसे में तुरंत ऑपरेशन से हड्डियों में संक्रमण का खतरा हो सकता था। अब सवाल यह है कि निजी अस्पताल में फिर उसका ऑपरेशन कैसे हो गया। आरबीएम अस्पताल प्रशासन का प्लान गुरुवार को ऑपरेशन करने का था, जबकि सुनीता निजी अस्पताल में ऑपरेशन कराकर छुट्टी भी ले चुकी है। उल्लेखनीय है कि सुनीता के पैर में दो रॉड डाली गई हैं।

हकीकत ये...यहां दोषियों को ही मिलता है जांच का जिम्मा

बात चाहे किसी सरकारी अस्पताल में टॉर्च की रोशनी में ऑपरेशन की हो या किसी अस्पताल में बधाई के नाम पर रिश्वत मांगने की, हकीकत यह है कि हरेक प्रकरण में दोषियों को ही जांच का जिम्मा सौंपा जाता है। दबाव में आकर दोषियों को क्लीन चिट भी मिल जाती है। हकीकत यह है कि तमाम सरकारी अस्पतालों में कमीशनबाजी के चलते डॉक्टरों के निजी नर्सिंग होम में ऑपरेशन कराने के लिए विजिटंग कार्ड तक अस्पतालों में बंटते हैं। यही कारण है कि अस्पताल में व्यवस्थाओं को सुधारने का दावा करने वाले अफसर भी हकीकत जानकर भी अनजान बने रहते हैं। यहां कभी-कभार बड़ा मामला सामने आने पर बड़े प्रशासनिक अधिकारी निरीक्षण के नाम पर खानापूर्ति करने के लिए दौड़ चले आते हैं और एक-दो दिन में व्यवस्थाओं को सुधारने का दम तक भरते हैं, लेकिन फिर भूल जाते हैं। इसी कारण जनाना अस्पताल, आरबीएम अस्पताल समेत जिले के तमाम अस्पतालों में इस तरह की समस्याएं सामने आती रही है। प्रत्येक मामले में कारण होते हुए भी आसानी से क्लीन चिट देने की परंपरा भी बनी हुई है।

इनका कहना है

पैसे वगैरह मांगने के आरोप निराधार हैं। हमने मामले की वास्तविक जांच कराकर रिपोर्ट जिला कलक्टर को सौंप दी है।
- डॉ. के.सी. बंसल, कार्यवाहक पीएमओ आरबीएम अस्पताल भरतपुर

Meghshyam Parashar Bureau Incharge
और पढ़े

राजस्थान पत्रिका लाइव टीवी

हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned