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राजस्थान विधानसभा चुनाव 2023: दिवाली बाद सजने लगा चुनावी बाजार, प्रत्याशी की फोटो वाली टी-शर्ट और टोपी का क्रेज

राजस्थान विधानसभा चुनाव में प्रत्याशियों के नाम की घोषणा के बाद चुनाव प्रचार शुरू हो गया है। शहर में झंडे-बैनर दुकानों पर सजने लगे हैं। डिजीटल दौर में भी पार्टियों के बिल्ले, टोपी, गमछे के साथ नाम वाली टी-शर्ट का क्रेज बढ़ रहा है।

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Rajasthan Assembly Election 2023 : राजस्थान विधानसभा चुनाव में प्रत्याशियों के नाम की घोषणा के बाद चुनाव प्रचार शुरू हो गया है। शहर में झंडे-बैनर दुकानों पर सजने लगे हैं। डिजीटल दौर में भी पार्टियों के बिल्ले, टोपी, गमछे के साथ नाम वाली टी-शर्ट का क्रेज बढ़ रहा है। अधिकांश प्रत्याशी थोक में ऑर्डर देकर चुनाव प्रचार की सामग्री को तैयार करा रहे हैं। चुनावी माहौल में झंडे-बैनर, टोपी, बिल्ले न हों तो चुनावी माहौल फीका नजर आता है। बाजार में दिल्ली, जयपुर से सामग्री आ रही है। व्यापारी उमीद लगा रहे हैं उन्हें बड़े ऑर्डर मिल जाएंगे।

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प्रिंट करा रहे हैं नाम और फोटो
बाजार में सभी पार्टियों के चुनाव चिन्ह की सामग्री उपलब्ध है। इस बार खास बात यह है कि प्रत्याशी अपने नाम और फोटो को प्रिंट करा रहे हैं। इसके लिए उन्हें अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है। साधारण टी-शर्ट की कीमत 180 से शुरू हो रही है। वहीं उसी टी-शर्ट को प्रिंट कराने पर 220 रुपए दे रहे हैं। प्रत्याशियों के नाम की घोषणा के बाद ऑर्डर मिलने शुरू हो गए हैं। दिल्ली और जयपुर से सबसे अधिक सामग्री आ रही हैं।

5 रुपए से 200 तक सामान उपलब्ध
व्यापारियों ने बताया कि बाजार में प्रचार में उपयोग में आने वाली सामग्री पांच रुपए से शुरू हो रही है। टी-शर्ट के दाम कपड़े की गुणवत्ता व प्रिंटिंग के अनुसार भी तय किए जा रहे हैं। राजनीतिक पार्टियों की सभा, रैलियां और चुनाव के दौरान ही यह प्रचार सामग्री अधिक बिकती है।

बीती जा रही है जिंदगी दरी-फट्टा उठाते-उठाते
बड़े नेता आएं तो भीड़ हम जुटाएं, पोस्टर-बैनर, झंडा लगाएं, दरी-फट्टा उठाते-उठाते बीती जा रही जिंदगी। काकाजी ठीकई कहते थे पढ़-लिख लो, नेतागिरी ते जीवन ना चलै। अब घर वाले भी खरी-खोटी सुना रएं। दशकों से बतौर राजनीतिक दलों के कर्मठ कार्यकर्ता सेवाएं दे रहे लोगों के घरों पर चुनाव अभियान से जुडऩे का बुलावा आ रहा है। ऐसे में घर वाले उन्हें खूब खरी खोटी सुना रहे हैं। परिवार के लोगों का कहना होता है कि राजनीति से रोजी-रोटी नहीं चलती। बच्चों की स्कूल की फीस का इंतजाम नहीं होता। ऐसी राजनीति किस काम की है।

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नहीं छूट रहा मोह
वर्षों तक वार्डों से लेकर बूथ तक सक्रिय रहने वाले कार्यकर्ताओं का सियासी मोह नहीं छूट रहा। बड़े नेता उन्हें दिलासा दिला रहे हैं कि सरकार बनी तो मंडल, परिषद्, प्राधिकरण में कहीं न कहीं जिम्मेदारी दिलाएंगे। ऐसे में पार्टी के खूंटी कार्यकर्ताओं का मोह नहीं छूट रहा है, क्या मालूम इस बार चुनाव के कहीं अवसर मिल ही जाए। हालांकि उन्हें ऐसी दिलासा वर्षों से दिलाई जा रही है। फिर भी भरोसे पर तो दुनिया कायम है।