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Rajasthan Election 2023 : चुनावों के बीच जुबानी जंग शुरू, कांग्रेस को सत्ता का सहारा तो मोदी के भरोसे भाजपा

Rajasthan Election 2023 : आचार संहिता की स्थिति अब ‘कभी भी’ मोड में पहुंच गई है, लेकिन इससे पहले ही चुनावी शोरगुल खूब हो रहा है।

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भरतपुर Rajasthan Election 2023 : आचार संहिता की स्थिति अब ‘कभी भी’ मोड में पहुंच गई है, लेकिन इससे पहले ही चुनावी शोरगुल खूब हो रहा है। कांग्रेस नेता कॉलर ऊंची करके यह बताने की फिराक में हैं कि हमने विकास के बहुतेरे काम कराए हैं। उधर, सत्ता से बाहर बैठी भाजपा मोदी नाम के सहारे चुनावी मैदान में है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी.नड्डा और केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह भरतपुर के दौरे पर यह बात अच्छी तरह बता चुके हैं।

भरतपुर संभाग की बात करें तो भाजपा नेता केन्द्र सरकार के विकास के नाम पर वोट मांगने जा रहे हैं, लेकिन पिछले पांच सालों में पीएम नरेन्द्र मोदी की सभा संभाग में नहीं हो सकी है। भाजपा का मानना है कि उनकी नैया के खिवैया मोदी ही हैं। ऐसे में पूरे संभाग के नेताओं की पुरजोर मांग है कि एक सभा संभाग में पीएम की कराई जाए, जिससे सत्ता से बाहर बैठी भाजपा का चुनाव में बेड़ा पार लग सके। भले ही कांग्रेस के नेता योजनाओं और विकास कार्यों को लेकर मैदान में जा रहे हों, लेकिन राह अभी इतनी आसान नहीं है। वजह, एंटी इन्कमबेंसी का असर अब तक के चुनावों में नजर आया है। इस बार भी इसका असर इस बार भी देखा जा सकता है। हालांकि दावों में कांग्रेस इतिहास लिखने की बात कह रही है।

ऐनवक्त फोड़े नारियल
कांग्रेस नेताओं का फोकस आचार संहिता से ठीक पहले उद्घाटन, शिलान्यास और लोकार्पण पर है। विकास कार्यों पर अपने नाम की पट्टिका लगवाने को नेता लालायित हैं, इससे चुनावी समर में विकास का बखान किया जा सके। पिछले करीब 20 दिन से हर विधानसभा क्षेत्र में ऐसे कार्यक्रमों की बाढ़ सी आ गई है। आलम यह है कि काम अधूरा हो या हो पूरा पट्टिका लगाने की होड़ सी मची हुई है। उधर, भाजपा नेता विकास के दावों को खोखला साबित करने में जुटे हैं।

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बागी बिगाड़ेंगे खेल!
चुनावी आहट के बीच टिकट वितरण में दोनों ही दल फूंक-फूंककर कदम रखते नजर आ रहे हैं। इसकी वजह यह है कि टिकट वितरण से नाराज होने वालों को समय रहते ही साध लिया जाए। अनुमान है कि कांग्रेस विकास के मुद्दे को लेकर अपने पुराने नेताओं पर ही दांव लगाएगी। ऐसे में यहां बागी होने का डर कम है। उधर, भाजपा में पिछले पांच सालों में कुछ लोग उभरे हैं, जो टिकट की दौड़ में शामिल हो गए हैं। कुछ ने तो पहले से ही प्रचार भी शुरू कर दिया और उनके ‘रथ’ क्षेत्रों में दौड़ने लगे हैं। इनमें कई ऐसे हैं, जो टिकट की दौड़ में सटीक साबित नहीं हो रहे हैं। ऐसे में भाजपा को इन्हें साधना बड़ी चुनौती है।

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