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आठ माह से सउदी अरब में बंधक बने विश्राम को मिला आराम

-नदबई के गांव कटारा निवासी कीकहानी

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आठ माह से सउदी अरब में बंधक बने विश्राम को मिला आराम

आठ माह से सउदी अरब में बंधक बने विश्राम को मिला आराम

भरतपुर. सउदी अरब में करीब आठ माह से बंधक विश्राम जाटव शुक्रवार को अपने नदबई के गांव कटारा पहुंचे। इससे पहले भरतपुर के रेलवे स्टेशन पर पहुंचने पर उनका स्वागत किया गया। वे परिवार से मिलकर भावुक हुए। अमानवीय यातनाओं को याद कर रोने लगे। संकटग्रस्त भारतीयों की सहायता के लिए कार्य करने वाले राजस्थान के कांग्रेस नेता चर्मेश शर्मा सुबह विश्राम जाटव को लेकर भरतपुर रेलवे स्टेशन पहुंचे। रेलवे स्टेशन पर विप्र फाउंडेशन के प्रदेश महासचिव अभिषेक तिवारी, जाट महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. लोकपाल सिंह, सुरेन्द्र कश्यप, देवेश चौधरी आदि ने स्वदेश वापसी पर विश्राम जाटव व चर्मेश शर्मा का भरतपुर रेलवे स्टेशन पर माल्यार्पण कर स्वागत किया।
अपनी आपबीती बताते हुए विश्राम जाटव ने बताया कि कि सउदी अरब के यंबू शहर में पिछले आठ माह से उन्हें व बून्दी जिले के मित्र को बंधक बना रखा था।अ मानवीय यातनाओं को यादकर विश्राम जाटव के आंसू आ गए। जाटव ने कहा कि वहां खाना-पीना तक नहीं देते थे। वे आठ माह से दूसरे कर्मचारियों को दिए जाने वाले खाने में से बचा कुचा खाकर अपना जीवन चला रहे थे। जाटव ने बताया कि एक पैर में बीमारी हुई तो इलाज तक नहीं मिला। एक समय तो हमने वापसी की उम्मीद ही छोड़ दी थी,क्योंकि दूसरे देशों के कुछ लोगों को तो सउदी कंपनी ने 14 महीने से भी अधिक समय से बंधक बना रखा है। कुछ दिन पूर्व कंपनी के एचआर मैनेजर फरीद ने हमें धमकी देकर कहा कि कुछ भी कर लो तुम्हें एक वर्ष तक नहीं भेजेंगे तो हम पूरी तरह निराश हो गए थे, लेकिन कांग्रेस नेता चर्मेश शर्मा ने हमें हौसला बंधाया। उन्होंने राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री कार्यालय, विदेश मंत्रालय व सऊदी दूतावास के माध्यम से अपने अथक प्रयासों से असंभव को संभव कर दिखाया और हमें वापस लाकर ही दम लिया।

दो वर्ष के एग्रीमेंट पर गए थे विदेश

उन्होंने बताया कि गरीबी में रोजगार की आस में विश्राम जाटव व बून्दी जिले के मित्र सहित दोनों कुछ वर्ष पूर्व एक एजेंट के माध्यम से सउदी अरब गये थे, लेकिन रोजगार तो गया ही सही दोनों की जान के भी लाले पड़ गए। सउदी अरब के यम्बू में कम्पनी में अक्टूबर 2020 में दो वर्ष का वर्क एग्रीमेंट पूरा होने पर दोनों भारतीयों ने स्वदेश आने की इच्छा जताई तो कंपनी ने इन्हें भारत भेजने के बजाय वहीं पर बंधक बना लिया। कम्पनी ने इनको खाना देना भी बंद कर दिया। आठ माह तक दोनों भारतीय दूसरे कर्मचारियों को दिए जाने वाले खाने में से बचा खुचा खाकर अपना जीवन चलाते रहे।