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यहां 14 वर्ष से ग्रामीण हाट में सजता है तिब्बती बाजार

-स्वीकृति लेते हैं, लेकिन व्यवस्थाएं खुद करते हैं

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यहां 14 वर्ष से ग्रामीण हाट में सजता है तिब्बती बाजार

यहां 14 वर्ष से ग्रामीण हाट में सजता है तिब्बती बाजार

भरतपुर. सर्दियों ने दस्तक दे दी हैं। इसके साथ शहर में गर्म कपड़ों के बाजार सजने लग गए हैं। सूरजपोल चौराहा स्थित ग्रामीण हाट में भी तिब्बत बाजार सज गया है। इस बार आधुनिक फैशन के आइटम के साथ तिब्बती दुकानदार आए हैं। यहां 14 साल से लगातार गर्म कपड़ों का बाजार लग रहा है। सर्दी की शुरुआत होने पर गर्म कपड़ों की खरीदारी के लिए शहर का एक बड़ा तबका तिब्बत बाजार लगने का इंतजार करता है। दुकानदारों ने बताया कि बाजार में 200 रुपए से लेकर 2500 रुपए तक के आइटम हैं। पुरुषों के लिए लेदर लुक जैकेट, पैराशूट फैबरिक जैकेट, स्पोर्टी जैकेट की रेंज है। वहीं महिलाओं के लिए शॉल, जैकेट, कुर्ती और लैगिंग आई हैं। बाजार में 15 दुकानें लगी हैं। करीब फरवरी के अंत तक बाजार चलेगा।

तिब्बती नहीं भारत के शरणार्थी

तिब्बत रिफ्यूजी मार्केट, रिफ्यूजी शब्द अपने आप में शरणार्थी का पर्याय है। सर्दियों में शहर में जो गर्म कपड़ों का व्यापार करने तिब्बती आते हैं दरअसल, वे तिब्बती नहीं भारत के शरणार्थी हैं। वर्ष 1960 में जब तिब्बत देश बना तो वहां के कई निवासी भारत के हिमाचल में विभिन्न स्थानों पर आकर बस गए। भारत में शरणार्थी के रूप में वर्तमान तिब्बतियों को उस समय भारत सरकार ने रहने के लिए जमीन दी थी और उनके लिए बूलन के कारोबार की व्यवस्था करवाई। तब से लेकर आज तक पीढ़ी दर पीढ़ी से तथाकथित तिब्बती ऊनी कपड़ों का व्यापार कर रहे हैं। बताया गया है कि पूरे भारत में सर्दियों के दिनों में जहां भी तिब्बती बाजार सजता है वहां तिब्बती शरणार्थी ही होते हैं जो अधिकांश हिमाचल प्रदेश के मनाली सहित अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में रहते हैं।

अनुमति लेने के बाद भी प्रशासनिक सहायता नहीं

प्रत्येक वर्ष हिमाचल प्रदेश से आने वाले इन तथाकथित तिब्बतियों को ग्रामीण हाट में तिब्बती बाजार सजाने से पहले जिला कलक्टर से अनुमति लेनी पड़ती है। इसके बाद ही यहां बाजार सजता है। जिला प्रशासन की ओर से अनुमति तो मिलती है लेकिन बाहर से आए इन लोगों के लिए कोई व्यवस्था नहीं की जाती। ये लोग अपने स्तर पर ही अपने खाने-पीने, बाथरूम बनाने और सफाई की व्यवस्था करते हैं।

2007 में पहली बार लगा था बाजार

शहर की ग्रामीण हाट में पहली बार तिब्बती बाजार वर्ष 2007 में लगा था और तब से अब तक लगातार यह बाजार सुचारू रूप से चलता आ रहा है। ये व्यापारी अधिकांश यहां अक्टूबर के अंतिम या फिर नवम्बर के प्रथम सप्ताह में अपनी दुकानें लेकर यहां आ जाते हैं।

मोलभाव हुआ कम

तिब्बती दुकानदारों ने बताया कि पिछले 14 साल में बहुत से बदलाव आए, मगर, एक सबसे बड़ा बदलाव मोलभाव को लेकर आया है। पहले लोग बहुत मोलभाव करते थे लेकिन अब इसमें कमी आई है। लोग फिक्स प्राइज का टैग देखकर मोलभाव की बात नहीं करते हैं।

इनका कहना है ...

- हम लगातार 2007 से यहां गर्म कपड़ों का व्यापार करने आते हैं। ये व्यापार हमारे पूर्वजों के समय से ही चलता आ रहा है। व्यापार में शहरवासियों का भरपूर सहयोग मिलता है।

तेनजिन, प्रमुख, तिब्बती रिफ्यूजी बाजार

- मैंने यहां 2010 में आना शुरू किया था। शुरूआत में संवाद के समय भाषा को लेकर काफी समस्या आती थी लेकिन धीरे-धीरे भाषा का भेद समाप्त हो गया और समस्या कम हो गई।

तनु, दुकानदार, मनाली (हिमाचल प्रदेश)

- पहले शहरवासियों को ऊनी सामान महंगा लगता था और वे मोलभाव करते थे।मगर अब क्वालिटी मिलने पर मोलभाव भी नहीं करते और सभी कपड़ों पर फिक्स रेट का टैग लगा होता है।

पेमा, दुकानदार, मनाली (हिमाचल प्रदेश)

- प्रत्येक वर्ष यहां बाजार लगाने आते हैं। यहां आकर सभी व्यवस्था हमारी ओर से की जाती हैं। इनमें प्रशासन का कोई सहयोग नहीं होता। प्रशासन को कम से कम सफाई कर्मचारियों की व्यवस्था तो करवानी चाहिए।

दोरजे, दुकानदार

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