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पर्यटक बेशुमार, सूरत संवारने की दरकार

- पर्यटन के लिहाज से समृ़द्ध है वैर-भुसावर क्षेत्र

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पर्यटक बेशुमार, सूरत संवारने की दरकार

पर्यटक बेशुमार, सूरत संवारने की दरकार

भरतपुर . भरतपुर की धरा राष्ट्रीय धरोहर को समेटे हुए है। अजेय का तमगा भी लोहागढ़ के पास है। वीरता के किस्से रोंगटे खड़े करने वाले हैं। इस विरासत की बानगी तमाम किले, जलमहल, विजय मंदिर आदि में बखूबी देखे जा सकते हैं। घना पक्षी विहार की बदौलत जिले को सैलानियों का दुलार खूब मिलता है, लेकिन अन्य विरासत अब धूल फांक रही हैं। यदि इन्हें समय रहते नहीं संवारा गया तो इतिहास सिमटकर रह जाएगा। इन पर्यटन स्थलों को संवारने का काम हो जाए तो यहां पर्यटन को पंख लग सकते हैं।
जिले में अन्य महत्वपूर्ण स्थानो के साथ वैर-भुसावर क्षेत्र की बात करें तो यह पर्यटन की दृष्टि से खासा महत्वपूर्ण है। अनेकों किले इसकी कहानी कहते नजर आते हैं। रजवाड़ा के समय की प्राचीन धरोहरें यहां की आन-बान-शान के किस्से सुनाती नजर आती हैं, लेकिन अब यह विरासत जनप्रतिनिधियों की अनदेखी का खामियाजा भुगत रही हैं। वैर के प्रताप किला, सफेद महल एवं फुलवाड़ी को सरकार से बजट तो मिला, लेकिन इनकी हालत नहीं सुधर सकी। इनके साथ नौलक्खा बाग, वैर की बावड़ी, रायपुर की गुफा, बल्लभगढ़ का राजा बल्लभ सिंह का किला, घुड़साल, हाथी घर, बल्लभगढ़ की बावड़ी, दीवली की हवेली, सलेमपुर कलां की हवेलियां, भुसावर में बाबा मोतीराम की कचहरी, हाथोड़ी का किला, जल महल, दौलतगढ़ का कुआं एवं सीता कुंड आदि दर्शनीय स्थल हैं, जो दर्शकों का अपनी ओर खींचते हैं, लेकिन सरकारी अनदेखी के चलते पर्यटकों को यहां खासी परेशानियां झेलनी पड़ती हैं।

इसलिए हुआ था निर्माण

राजाओं के समय में किलों की सुरक्षा को लेकर बड़े पहाड़ी भू भाग पर जमीन से करीब सात सौ मीटर ऊंचाई पर दुर्ग बनाए गए थे। रियासतकाल चले जाने के बाद इन अब ऐतिहासिक धरोहरों का कोई धणी-धोरी नहीं है। ऐसे में यह जर्जर होते जा रहे हैं। आलम यह है कि किले और गढिय़ों की देखरेख नहीं होने के कारण यह बदहाल स्थिति में पहुंच गए हैं। पुरातत्व विभाग भी इनकी सुध नहीं ले रहा है। यदि समय रहते इन पर ध्यान नहीं दिया गया तो इनका जमींदोज होना तय है। अनदेखी का नतीजा यह है कि अब यह पर्यटकों की नजरों से दूर होते जा रहे हैं।

सात मंजिल जलमहल रह गया तीन मंजिला

वैर विधानसभा क्षेत्र की बात करें तो यहां पर्यटन की अपार संभावनाए हैं। इनमें रियासत काल के किले और दुर्ग हैं। वैर-बल्लभगढ़ सड़क मार्ग पर पहाड़ की तलहटी में एक कटोरनुमा आकृति में बसा गांव है। इस गांव में एक जल महल है। यह जलमहल बनने के समय सात मंजिला था, जो अब महज तीन मंजिला ही नजर आता है। चार मंजिल यहां जमीन के नीचे दब गई हैं। इस जलमहल में उतरने के लिए 52 सीढिय़ां बनी हैं, लेकिन यहां साफ-सफाई नहीं होने के कारण इसका सौंदर्यीकरण बिगड़ रहा है।

यह कहते हैं जानकार

यह गांव ग्राम पंचायत हाथौड़ी में आता है। गांव में सात सौ मीटर ऊंची पहाड़ी पर 17वीं शताब्दी में गुमान सिंह उलहेरिया नामक रियासत काल में इसी गांव गुमान सिह जाट ने दुर्ग का निर्माण कराया था। इस किले के मुख्य दरवाजे पर हनुमानजी का मंदिर है और पास ही किलो है, जो पहाड़ी पर दूर से ही नजर आता है। इस किले में एक बिना मुंडेर वाला कुआं भी है, जिसमें हमेशा पानी रहता है। इस किले के आसपास सुरक्षा की दृष्टि से छह बुर्ज अभी भी विद्यमान हैं। किले में तोप चलाने के लिए अलग-अलग बुर्ज हैं। इनके अंदर से दुश्मन को पराजित करने के लिए सामंतशाही की ओर से तैनात सैनिकों की ओर से गोले दागे जाते थे, लेकिन अब यह बदहाल स्थिति में हैं।

विश्व के नक्शे तक पहुंचे विरासत - गुप्ता

समृद्ध भारत के संयोजक सीताराम गुप्ता ने केन्द्र एवं राज्य सरकार से वैर-भुसावर उपखंड क्षेत्र की प्राचीन धरोहरों को विश्व के मानचित्र पर ले जाने के लिए पत्र व्यवहार किया है। गुप्ता ने पर्यटन के कैबिनेट मंत्री विश्वेन्द्र सिंह को इस संबंध में पत्र लिखा है। पत्र में गुप्ता ने कहा है कि इन धरोहरों को रखरखाव एवं जीर्णोद्धार की दरकार है। पर्यटन मंत्री के साथ गुप्ता ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को भी पत्र लिखा है। पर्यटन मंत्री सिंह से मुलाकात के दौरान गुप्ता ने कहा कि भरतपुर जिले के उपखंड बयाना, वैर एवं भुसावर में प्राचीन धरोहरें हैं, जो इतिहास की साक्षी हैं। यह विश्व के नक्शे में शामिल हो जाएं तो यह पर्यटन स्थल बन सकती हैं। उन्होंने कहा कि गांव हाथौड़ी की बावड़ी, सलेमपुर कलां में महाराजा सूरजमल की ससुराल की हवेलियां, पथैना की धनेरी गुफा, बल्लभगढ़ का किला, वैर के सफेद महल, प्रताप किला व प्रताप फुलवाड़ी, हलैना का अतिराम महल व अतिराम सागर तथा बयाना में सिकंदरा का किला ऐसी धरोहरें हैं, जिन्हें संवारने की जरूरत है। गुप्ता ने कहा कि बयाना में बाणासुर का ऐतिहासिक किला है। साथ ही महादेवजी का मंदिर है। पुरातत्व विभाग ने यहां सीढिय़ां तो बना दी हैं, लेकिन इनकी ऊंचाई बहुत ज्यादा है। ऐसे में लोगों को यहां चढऩे में तकलीफ होती है। पहाड़ पर तालाब एवं विजय मंदिर भी है। नीचे गांव अलीपुर है। यहां यदि रोप-वे बना दिया जाए तो ट्यूरिज्म की दृष्टि से यह मील का पत्थर साबित होगा। गुप्ता ने बताया कि बाणासुर किले के पास पेयजल की व्यवस्था की जा रही है। साथ ही यहां कुछ दुकानें भी खुलवाई जा रही हैं, जिससे लोगों का यहां सहज आवागमन हो सके।

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