
स्वांग प्रदर्शन से राजा को बताते थे प्रजा के साथ कौन कर रहा गलत व्यवहार
भरतपुर. वैसे तो ब्रज में शामिल भरतपुर में होली का अपना एक अलग रूप रहा ही है, लेकिन भरतपुर की स्थापना से लेकर अंतिम नरेश महाराजा सवाई बृजेंद्र सिंह के समय तक इस उत्सव को मनाने का अंदाज भी अनूठा रहा है। उसी विचित्र परंपरा में से एक था स्वांग कला का प्रदर्शन। स्वांग के कलाकार हंसी-हंसी में ही राज्य में अच्छी-बुरी घटनाओं का भी प्रदर्शन कर राजा को सच्चाई का आभास करा देते थे कि उनके राज्य में कौनसा अधिकारी-कर्मचारी या राजदरबारी जनता का क्या बुरा व भला कर रहा है। होली के बाद स्वांग के कलाकारों की दी गई जानकारी की सत्यता का परीक्षण कर श्रेष्ठ कार्मिकों को पुरस्कार एवं भ्रष्टों को सजा भी देते थे। ऐसा उस समय देश की अन्य किसी रियासत में नहीं होता था।
वरिष्ठ साहित्यकार रामवीर सिंह वर्मा बताते हैं कि उस समय महाराजा कभी-कभी अपने दरबारियों से चुहलबाजी करने भी नहीं चूकते थे। उन्होंने एक बार स्वांग के कार्यक्रम से पहले विद्युत विभाग को निर्देश देकर एक पतला नंगा तार बिछने वाली चादर के नीचे से डलवाया। जहां साधारणत: सभी सरदार बैठते थे। उसका एक स्विच जहां महाराजा की गद्दी के पास लगवा दिया। सारी सरदारी दोनों ओर बैठती थी, इसमें स्त्री व पुरुष अलग-अलग बैठते थे। यह तार दोनों ओर डालकर उसमें डीसी करंट का मात्र तीन बोल्ट करंट प्रवाहित किया जाता। जिस समय गाना बजाना या स्वांग कार्यक्रम चलते रहते, उसी समय महाराजा बटन दबाकर तीन बोल्ट का करंट का झटका देते। इससे वातावरण भी आनंदमय हो जाता था। उस समय भरतपुर की राजकीय व्यवस्था के तहत कोठी खास में दरबार लगता था। वहां होली खेली जाती थी। होली से सात दिन पूर्व होराष्टिक का मनाना शुरू होता था। हंसी मजाक के बीच ट्रे में रखे हुए कुमकुम को हाथ में लेकर एक-दूसरे के ऊपर फेंकते थे। इसमें लोकगीत व बृज के रसिया गाये जाते थे। महाराजा का बैंड भी प्रस्तुति देता था। इसके बाद होलिका दहन होता था। पहले यह होलिका दहन महल खास किला में होता था, उसके बाद यह पोलो ग्राउंड इजलास खास के सामने के क्षेत्र में रखा जाने लगा। यहां होलिका पूजन बड़ी शान-शौकत एवं धार्मिक आस्था के साथ किया जाता था। होलिका दहन पर पांच तोप चलती थी, इससे भरतपुर राज्य में सूचना मिल जाती थी कि महाराजा ने होलिका की पूजा कर दी है। सभी ग्रामीण परिवेश में लोग अपनी-अपनी होलियों को मगारने की परंपरा का निर्वहन करते थे। महाराजा धूलंडी वाले दिन हाथी पर बैठकर पूरे शहर में जनता के साथ होली खेलने निकलते थे। बाद में खुली कार रायल रोल्स में बैठकर होली खेलने की परंपरा प्रारंभ हुई। रोल्स कार के पीछे एक पावर पंप, इसमें एक लंबी रबड़ की नली लगी होती थी, उसका टैंक चलता था। पूरे टैंक में गहरा गुलाबी या पीला रंग भरा रहता था। उस पर पंप चलता रहता था। महाराजा पूरे शहर की आम जनता पर रंग डालते हुए निकलते थे।
पेड़ों से है सभी 12 राशियों व ग्रह-नक्षत्रों का संबंध
धार्मिक दृष्टि से भी पेड़ों पर किसी न किसी देवता का अधिपत्य होता है। उनमें देवी-देवताओं का वास माना जाता है। तीज-त्योहारों पर शास्त्रों में पेड़ों की पूजा करने का भी विधान है, जो हमारे लिए स्वास्थ्य वर्धक व हमारे प्राणों के रक्षक हैं। पेड़ों को काटने से बचना चाहिए, इससे हम अपने जीवन को भी सुरक्षित रख सकेंगे और ग्रह-नक्षत्रों की नाराजगी से भी बचेंगे। 12 राशियां, नौ गृह व 27 नक्षत्र होते हैं। सभी राशियों व ग्रह-नक्षत्रों का संबंध पेड़ों से होता है। व्यक्ति के जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, वही उसका जन्म नक्षत्र कहलाता है। हमारी कुंडली में भी विभिन्न स्थान पर ग्रह विद्यमान रहते हैं।
Published on:
08 Mar 2020 10:20 pm
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