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संसार के विषयों का विसर्जन करें, तभी आत्मा सुख प्राप्त हो सकता है- आचार्य श्रीविशुद्ध सागर

आचार्य ने कहा मांगने वाले को वह आनंद नहीं मिलता जो देने वाले को मिलता है। संसार में दुखियों का सहयोग करना आनंद है। देने का आनंद अलग है, लेकिन देने में भी सम्मान का भाव होना चाहिए। देते समय भाव होना चाहिए कि आपको सहयोग करने का मुझे सौभग्य मिल रहा है। ऐसा विचार आएगा तभी देने का आनंद आएगा।

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file photo

आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज इन दिनों ससंघ दुर्ग में विराजमान हैं। उनके सानिध्य में जैन समाज नसिया तीर्थ में भगवान की प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव की तैयारी कर रहा है। आचार्य धर्म के साथ जीवन के सच्चे आनंद के बारे में लोगों को बता रहे हैं। उनका आशीर्वाद लेने के लिए न केवल दुर्ग-भिलाई बल्कि दूसरे शहर से भी जैन समाज के लोग बड़ी संख्या में आ रहे हैं।

स्टेशन रोड स्थित श्रीमहावीर दिंगबर मंदिर से विहार करते समय चलते-चलते आचार्य से कुछ बातें हुई। उनसे आशीर्वाद लेने वालों की भीड़ रास्ते भर जुटी हुई थी। पत्रिका ने आचार्य से यह सवाल किया कि आज लोगों के पास सुख सुविधाओं के तमाम साधन हैं। ऐसे में जीवन खुशहाल होना चाहिए। जबकि सच्चाई इसके विपरीत है। आदमी सब कुछ रहते हुए भी जीवन में खुश नहीं है।

सच्चा आनंद त्याग में
जी वन का सच्चा आनंद त्याग में है। संग्रह करने के आनंद से त्यागने में अधिक आनंद है। सरल शब्दों में समझें तो भरपेट भोजन करने के आनंद से बड़ा आनंद पेट की सामग्रियों को विसर्जित करने से मिलता है। विसर्जन किए बिना आनंद नहीं आता। इसलिए संसार के विषयों का विसर्जन करें तभी आत्मा का सुख प्राप्त हो सकता है।

देते समय सम्मान का भाव होना चाहिए
आचार्य ने कहा मांगने वाले को वह आनंद नहीं मिलता जो देने वाले को मिलता है। संसार में दुखियों का सहयोग करना आनंद है। देने का आनंद अलग है, लेकिन देने में भी सम्मान का भाव होना चाहिए। देते समय भाव होना चाहिए कि आपको सहयोग करने का मुझे सौभग्य मिल रहा है। ऐसा विचार आएगा तभी देने का आनंद आएगा।

विशाल वृक्ष बनकर जीओ
समाज में विशाल वृक्ष बन कर जीने में आनंद है। विशाल वट वृक्ष के नीचे हाथी भी खड़ा है और चीटी भी। कई अन्य जीव जंतु भी उसके नीचे है पर वह किसी के साथ भेद नहीं करता। वट वृक्ष सबको समान रूप छाया देता है। इसलिए विशाल वृक्ष बनकर जीयो। विशाल वृक्ष बनकर जीने वाला ही दिगंबर है।

निंदा भी दुख का कारण
समाज में बुराई और निंदा करने वालों की कमी नहीं है। यह भी दुख का कारण है। यह सोच कर देखें कि जिसकी निंदा कर रहे हैं, जिसको बदनाम कर रहे हैं उसे जानकर कितनी पीड़ा होगी। इसलिए निंदा नहीं करनी चाहिए। इससे द्वेष बढ़ता है। उन्होंने कहा कि बद करना हिंसा है तो बदनाम करना भी हिंसा है।