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Exclusive : ये है देश का इकलौता गौ-हत्या पापमोचन कुंड, जहां द्वापर से लेकर कलयुग तक धुल रहा पाप

देश के इकलौते गौ-हत्या का पाप धोने वाले 16 वीं-17 वीं सदी के विष्णु मंदिर में आने वाले लोगों की तादात अचानक बढ़ गई है।

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भिलाई

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Dakshi Sahu

Aug 24, 2017

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दाक्षी साहू@भिलाई. द्वापर युग में गौ-हत्या का पाप धोने के लिए भगवान कृष्ण ने बाणासुर राक्षस को बानबरद के जिस पापमोचन कुंड में भेजा था कलयुग में उसकी उपयोगिता कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। प्रदेश में गौ सेवा के नाम पर गायों के साथ क्रूरता और बर्बरता की सारी हदें पार करने वाली घटनाओं के बीच ही देश के इकलौते गौ-हत्या का पाप धोने वाले 16 वीं-17 वीं सदी के विष्णु मंदिर में आने वाले लोगों की तादात अचानक बढ़ गई है।

अमूमन महीने में जहां पहले एक या दो लोग गौ-हत्या का पाप धोने यहां पहुंचते वहीं पिछले छह महीने से ५ से १० लोग गौ-हत्या का प्रायश्चित करने बानबरद गांव पहुंच रहे हैं। पापमोचन कुंड में स्नान कर भगवान विष्णु की प्राचीन मंदिर की परिक्रमा करके आत्म शुद्धि कर रहे हैं।

बावड़ी में स्नान से धुल जाता है गौ-हत्या का पाप
दुर्ग जिला मुख्यालय से 30 किमी. दूर स्थित बानबरद गांव के प्राचीन बावड़ी में स्नान करने से गौ-हत्या महापाप से मुक्ति मिलने की मान्यता प्राचीन काल से चली आ रही है। चतुर्भुज विष्णु मंदिर के पुजारी रमाकांत वैष्णव ने बताया कि उनकी सात पीढ़ी यहां गौ-हत्या पाप निवारण मुक्ति पूजा करते आ रही है।

प्रदेश के अलावा देश के कोने-कोने से रोजाना लोग पापमोचन कुंड में स्नान करके पूजा कराने पहुंचते हैं। पहले इक्का दुक्का लोग पहुंचते थे लेकिन कुछ समय से यहां गौ-हत्या पाप निवारण पूजा कराने वाले लोगों की संख्या बढऩे लगी है। प्रायश्चित करने वालों में ज्यादा संख्या छत्तीसगढ़ के लोगों की है।







21 दिन के अंदर कराना पड़ता है विधान
किसी कारण गौ-हत्या का पाप लग जाने के 21 दिन के अंदर विधान पूरा करना पड़ता है। तभी गौ-हत्या पापमोचन पूजा फलित होती है। पुजारी ने बताया कि छत्तीसगढ़ में प्रचलित मान्यता के अनुसार गौ-हत्या का पाप लगने के बाद उस व्यक्ति को २१ दिनों के लिए गांव से बाहर कर दिया जाता है। गांव के बाहर रहकर वह २१ गांवों से भिक्षा मांगता है।

भिक्षा में मिले पैसे और अन्न लेकर बानबरद के प्राचीन पापमोचन कुंड पहुंचता है। यहां पहले मुंडन करवाता है। बरेठ समुदाय के लोग उसके कपड़ों को शुद्ध करते हैं। जिसके बाद पापमोचन कुंड में स्नान करके भगवान विष्णु की पांच परिक्रमा करता है। तत्पश्चात भगवान विष्णु के समक्ष गौ-हत्या पापमोचन पूूजा पूरे विधि-विधान से की जाती है। फिर प्रसाद लेकर पूरे गांव को भोजन कराकर उसे समाज में पुन: शामिल किया जाता है। इस तरह गौ-हत्या के पाप से उसे मुक्ति मिलती है।

सैकड़ों गायों को झोक दिया यहां मौत के मुंह में
हाल ही में दुर्ग और बेमेतरा जिले में गौ सेवा के नाम पर राजपुर, रानो और गोड़मर्रा गौशाला को सैकड़ोंं गायों की कब्रगाह बनाने की अमानवीय घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। अनुदान और कमीशन के खेल में सैकड़ों गायों को भूखा, प्यासा रखकर उन्हें अकाल मौत के मुंह में ढकेल दिया गया। गौ संरक्षण का दावा करने वाली सरकार भी गायों के साथ हो रहे कू्ररता को रोकने में असफल रही है। ऐसे में कलियुगी पापियों के लिए बानबरद का ये गौ-हत्या पाप मोचन कुंड किसी वरदान से कम साबित नहीं हो रहा।


भगवान कृष्ण ने बताया था प्रायश्चित का ये रास्ता
बानबरद के प्राचीन चुतर्भुज विष्णु मंदिर की प्रचलित कथा के अनुसार लोगों ने बताया कि द्वापर युग में भगवान कृष्ण और राक्षस बाणासुर के बीच भयंकर युद्ध हुआ। जब बाणासुर युद्ध में पराजित होने लगा तो उसने कृष्ण की गायों की मारना शुरू कर दिया। एक दिन उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। तब भगवान कृष्ण की चरण में पहुंचकर उसने गौ-हत्या के पाप से मुक्ति का रास्ता पूछा।

द्वारकाधीश ने उसे कहा कि बानबरद नामक जगह पर एक बावड़ी में जाकर खुदाई करना। खुदाई में मिले विष्णु की प्रतिमा को मंदिर में स्थापित करके बावड़ी में स्नान और पूजन करना। तब जाकर गौ-हत्या के महापाप से मुक्ति मिलेगी। बाणासुर ने ठीक वैसा ही किया। लोगों की ऐसी मान्यता है कि तब से लेकर आज तक बानबरद में गौ-हत्या का पाप धोने लोग आते हैं। यह देश का इकलौता मंदिर है जहां गौ हत्या का पाप धुलता है।