
दाक्षी साहू@भिलाई. 15 अप्रैल 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए हमारे देश में किन्नरों और ट्रांसजेंडर्स को थर्ड जेंडर के रूप में पहचान दिया था। समय के साथ ऐतिहासिक फैसले की खुशियां प्रदेश के साथ ही देशभर में रहने वाले ट्रांसजेंडर्स के चेहरे से धूमिल हो गई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले के वक्त जो गाइडलाइन तृतीय थर्ड जेंडर समुदाय के उत्थान के लिए केंद्र और राज्य सरकार को जारी किया था, वो गाइडलाइन इन तीन साल में केवल आईडी कार्ड बनाने तक सिमटकर रह गई है। पहचान तो दे दिया लेकिन अधिकार से महरूम रखा है।
इसी बात से नाराज थर्ड जेंडर समुदाय फिर से न्याय के आस में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट जाने वाले छत्तीसगढ़ के लगभग 20 हजार थर्ड जेंडर का नेतृत्व पांच सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल कर रही है। जिसमें जिले की दो थर्ड जेंडर भी शामिल है। जो बकायदा जिले में लगभग 5 हजार ट्रांसजेंडर्स, किन्नर की स्थिति का पूरा ब्यौरा उच्चतम न्यायालय के समक्ष रखेंगे।
सरकार सुनती नहीं तो क्या करें..
थर्ड जेंडर समुदाय का छत्तीसगढ़ में नेतृत्व कर रही दुर्ग की ट्रांसजेंडर कंचन सेंदे्र ने बताया कि कोर्ट की गाइडलाइन दिखाकर अब वे थक चुकी हैं। महिला बाल विकास और समाज कल्याण विभाग केवल शिविर लगाकर खानापूर्ति कर रहा है। इन तीन सालों में प्रदेश सहित जिले में कितने ट्रांसजेंडर्स है, इसका सही आंकड़ा तक दोनों विभाग के पास नहीं है। सुविधाएं तो बहुत दूर की बात है।
यही हाल पूरे देश में है। इसलिए सरकार से पूछने की बजाय देशभर के थर्ड जेंडर समुदाय ने एकजुट होकर सीधे सुप्रीम कोर्ट से पूछने का निर्णय लिया है। 14 जनवरी, 2018 को मकर संक्रांति के दिन इस पूरे मामले को लेकर जनहित याचिका दायर की जाएगी।
कोर्ट के सामने इन बिंदुओं पर बात
थर्ड जेंडर समुदाय को मान्यता देने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें कई तरह के विशेषाधिकार भी दिए थे, लेकिन फिलहाल उनमें से 80 फीसदी विशेषाधिकार सरकारी फाइलों में कैद है। सुप्रीम कोर्ट जाने वाली रायपुर की यास्मीन किन्नर ने बताया कि वे थर्ड जेंडर बोर्ड की जगह आयोग की सिफारिश कोर्ट से करेंगी। आज भी राज्य सरकार और उसके अधिकारी हमें दूसरों की खुशियों में नाचने वाला, वाली समझते हैं। भेदभाव स्पष्ट रूप से नजर आता है।
इसके अलावा आयोग का अध्यक्ष मंत्री या राजनैतिक व्यक्ति की जगह थर्ड जेंडर समुदाय की प्रतिनिधि को बनाए जाने, थर्ड जेंडर के लिए उपयोग होने वाले अपशब्द जैसे छक्का, मामू पर पूरी तरह बैन लगाने, नौकरी में दो फीसदी आरक्षण को लागू करने, स्वास्थ्य सुविधाओं और सरकारी योजनाओं में आईडी कार्ड नहीं होने के कारण हो रही दिक्कतों के लिए उचित गाइडलाइन की मांग करते हुए बातें कोर्ट में रखने का प्रस्ताव बनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने तीन साल पहले कही थी यह बातें
सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में कहा था कि शिक्षण संस्थानों में दाखिला लेते वक्त या नौकरी देते वक्त ट्रांसजेंडर्स की पहचान थर्ड जेंडर के रूप में की जाए। किन्नरों या ट्रांसजेंडर्स की पहचान के लिए कोई कानून न होने की वजह से उनके साथ शिक्षा या जॉब के क्षेत्र में भेदभाव नहीं किया जा सकता। स्पेशल पब्लिक टॉयलेट बनाए जाएं और साथ ही उनकी हेल्थ से जुड़े मामलों को देखने के लिए स्पेशल डिपार्टमेंट बनाए जाएं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर कोई अपना सेक्स चेंज करवाता है, तो उसे उसके नए सेक्स की पहचान मिलेगी। इसमें कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता। केंद्र और राज्य सरकारों से कहा था कि तीसरे जेंडर वाली कम्यूनिटी के सामाजिक कल्याण के लिए योजनाएं चलाई जाएं। उनके प्रति समाज में हो रहे भेदभाव को खत्म करने के लिए जागरूकता अभियान भी चलाए जाएं। ये सारी बातें आज भी धरातल पर नहीं आ पाई हैं। जिसके कारण देशभर के थर्ड जेंडर एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट की शरण में पहुंच गए हैं।
Published on:
01 Nov 2017 03:02 pm
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