
कबूतरबाजी में प्रदेशस्तर की प्रतियोगिता में भिलायंस का दबदबा
भिलाई. कबूतरबाजी में प्रदेशस्तर की प्रतियोगिता रविवार को शुरू हुई। मई के माह में बाज आसमान से गायब हो जाते हैं, इस वजह से यह प्रतियोगिता इस माह में हर साल होती है। इसमें प्रदेश के करीब 40 खिलाडिय़ों ने अपने-अपने 11-11 कबूतर उड़ाए। इस प्रतियोगिता में सबसे अधिक खिलाड़ी भिलाई और रायपुर से हिस्सा लेते हैं। जिसमें एक कप अगर राजधानी के हिस्से में जाता है तो दो भिलाई के हाथ आता है। यहां के कबूतरबाज इसके इतने शौकीन हैं कि जो विदेश में नौकरी करने जाते हैं, वे भी इसमें हिस्सा लेने के लिए साल में एक बार वतन लौट आते हैं। अगर नहीं आ पाते हैं तो उनके भाई कबूतर उड़ाकर उनके शौक को पूरा करते हैं। छत्तीसगढ़ स्तर की यह प्रतियोगिता हर साल मई में होती है। कोरोनाकाल के दौरान दो साल तक यह प्रतियोगिता नहीं हो सकी। अब पुन: शुरू हुई है।
11 घंटे तक उड़ता रहा कबूतर
रविवार को सुबह 6 बजे से कबूतर उड़ाए गए, रायपुर के जिस कबूतर ने यह प्रतियोगिता जीती वह शाम 5 बजे आसमान से उतरा। रायपुर के तन्नू भाई का यह कबूतर था, जो हर साल अलग-अलग प्रतियोगिया में जीत हासिल करते हैं। इन कबूतरों को प्रतियोगिता के लिए पहले तैयार किया जाता है। पहले कबूूतरों को धूप में किस तरह अधिक समय तक उडऩा है, इसका प्रशिक्षण दिया जाता है। कबूतर जब भीषण गर्मी में आसमान पर घंटेभर उड़ान भरता है, तब उस पर नजर रखने वाले कबूतरबाज धूप में आसमान पर टिकटिकी लगाए मौजूद रहते हैं।
नई तकनीक का किया जा रहा इस्तेमाल
प्रतियोगिता के दौरान कबूतरों पर आसमान में घंटों तक नजर ऑनलाइन कैमरे से रखी जाती है। हर घंटे में कबूतर का वीडियो वाट्सएप पर लोड किया जाता है। कबूतरों पर नजर रखने के लिए अंपायर भी हर जगह तैनात रहते हैं। सुपेला निवासी कबूतर उड़ाने के शौकीन राजकुमार ने बताया कि कबूतरबाजी का शौक महंगा है। कबूतर वफादार पक्षी है कितने देर भी आसमान में उड़ता रहे, लौटकर अपने मालिक के पास ही आता है। वह एक बार जिस घर को पहचान लेता है, उसे नहीं छोड़ता। कबूतर जब दो से तीन माह के हो जाते हैं तब से ही उनको प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया जाता है।
भिलाई में अलग-अलग स्थान से उड़ाए कबूतर
भिलाई में सुपेला, खुर्सीपार, रिसाली जैसे अलग-अलग स्थानों से कबूतर उड़ाए गए। लाला खलीफा की टीम के देवेंद्र देशमुख ने भी एक कप इस बार जीता है। लोकेश, चंदन और शाहिद भी बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। इसके पहले भिलाई सेक्टर-1 के लिंकन का जादू चलता था। उन्होंने पांच में से चार प्रतियोगिता अपने नाम की थी।
भिलाई में शौकीनों की नहीं है कमी
देश की प्राचीन परंपरा जहां दम तोड़ रही है। वहीं राजघराने की इस परंपरा को छत्तीसगढ़ के शौकीनों ने आज भी जीवित रखा है। पुराने समय में कबूतरबाजी या कबूतर उड़ाना मनोरंजन का साधन था। भिलाई में भी इसके शौकीनों की कमी नहीं है। यहां शौकीन बेहतर नस्ल वाले कबूतर के जोड़े को 1 से 50 हजार रुपए तक में खरीद कर उनकी खिदमत करते हैं। जिससे वे आसमान में घंटों उड़ते रहें। कबूतर की कीमत उसके नस्ल पर निर्भर करती है। जीतने वाले कबूतर की नस्ल को बढ़ाया जाता है।
पिस्ता, बादाम खिलाने से पंखों में आती है ताकत
प्रतियोगिता में हिस्सा लेने वाले कबूतरों के खानपान पर खास ध्यान रखा जाता है, उनको बाजरा, गेंहू से लेकर बादाम, पिस्ता, किशमिश तक लोग खिलाते हैं। कबूतर के पंख में उडऩे के लिए अधिक से अधिक ताकत मौजूद रहे, इसके लिए यह जतन किए जाते हैं। लोग अब घरों में शो वाले कबूतर पालते हैं। आगरा से मसक्ली कबूतर लाकर लोग पाल रहे हंै, जिसकी कीमत जोड़ा 10 हजार रुपए तक हैं।
Published on:
08 May 2022 10:23 pm
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