
Today Vegetable Price : टमाटर से पहले इस सब्जी के दाम में आई बड़ी गिरावट, 30 रुपए किलो पहुंचा रेट, किसान परेशान
दुर्ग. सब्जियों में बेतहाशा महंगाई के बाद भी किसानों को लागत मूल्य नहीं मिल पा रहा है। यह सुनने में अटपटा लग सकता है, लेकिन दुर्ग-भिलाई की मंडियों की व्यवस्था में खामियों की वजह से ऐसा हो रहा है। इसका प्रमाण एक दिन पहले ही भिलाई की मंडी में खीरे की बिक्री का उदाहरण है। कई महीने मेहनत के बाद उपजे खीरे की मंडी में किसान को 1.36 रुपए से 4.54 रुपए किलो भाव मिला। वहीं इसी मंडी परिसर और खुले बाजारों में वही खीरा चिल्हर में 30 रुपए किलो तक बिक रहा है। इस तरह कमीशन एजेंट से लेकर चिल्हर विक्रेता तक चंद घंटे में ही किसानों से 5 से 6 गुना तक कमाई कर रहे हैं।
सब्जी उत्पादक किसान और छत्तीसगढ़ प्रगतिशील किसान संगठन के प्रदेश अध्यक्ष आईके वर्मा ने बताया कि उन्होंने एक दिन पहले भिलाई के सब्जी मंडी में 19 कैरेट (प्रत्येक कैरेट में 22 किलो) खीरा बिक्री के लिए भेजा। इसमें 10 कैरेट (220 किलो) खीरा 100 रुपए प्रति कैरेट यानि महज 4 रुपए 54 पैसे प्रति किलो के हिसाब से बिका। वहीं शेष 9 कैरेट ( 198 किलो) खीरे का केवल 30 रुपए प्रति कैरेट यानि 1 रुपए 36 पैसे प्रति किलो का भाव मिला। इस तरह उन्हें 10 कैरेट का 1 हजार और 9 कैरेट का 260 रुपए कुल 1260 रुपए मिला। उन्होंने बताया कि इस भाव से फसल की लागत तो दूर तुड़ाई का भी खर्चा पूरा नहीं हुआ।
मूल्य निर्धारण - सब्जियों की कीमत को लेकर कोई भी गाइड लाइन नहीं है। किसान पैदावार खराब होने के खतरे के कारण कम कीमत में भी बिक्री के लिए तैयार हो जाते हैं।
कीमतों का डिस्प्ले - देशभर की मंडियों को आपस में जोड़कर कीमतों को डिस्प्ले करने और ऑनलाइन खरीदी-बिक्री की व्यवस्था का भी प्रावधान है, लेकिन मंडी में इन दोनों व्यवस्थाओं पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
अनुकूल टाइमिंग- कोरोना काल के बाद मंडी की टाइमिंग सुबह 6 से 12 बजे तय है। इसके बजाए एजेंट 4 बजे मंडी शुरू कर अधिकतम 7 बजे नालामी खत्म कर देते हैं। देर से पहुंचने पर एजेंटों के गोडाउन में रखवाकर बिक्री की मजबूरी रहती है।
मंडी एक्ट में संशोधन - किसान के उत्पाद की पारदर्शिता से खरीदी के लिए मंडियों की व्यवस्था बनाई गई। इसके तहत मंडी प्रशासन की देखरेख में नीलामी होनी चाहिए। इसकी जगह मंडियों की व्यवस्था को एजेंटों के हवाले कर दिया गया है।
एजेंट एक ओर जहां कीमत में मनमानी कर रहे हैं, वहीं 8 फीसदी मोटी कमीशन भी मार रहे हैं।
वर्जन
कीमत कम, इस पर कमीशन की मार
किसान आईके वर्मा ने बताया कि खीरे और गलके की इस कीमत पर उन्हें कमीशन एजेंट और दूसरे कार्यों के एवज में मोटी रकम भी चुकानी पड़ी। इसमें 8 फीसदी की दर से कमीशन एजेंट को 160 रुपए, अनलोडिंग का 44 रुपए, वाहन भाड़ा के रूप में 440 रुपए और अन्य खर्च के लिए 10 रुपए भुगतान करना पड़ा। इस तरह खीरे और गलके की बिक्री से मिले 1 हजार 990 रुपए में से 654 रुपए कमीशन और दूसरे खर्चों में चले गए।
थोक में 15, खुले में 50 रुपए गलका
खीरे के अलावा गलके के बिक्री से भी किसानों के नुकसान का समझा जा सकता है। किसान आईके वर्मा ने बताया कि उन्होंने भिलाई की मंडी में खीरे के साथ 48 किलो गलका भी भेजा था। इसकी नीलामी में महज 15 रुपए किलो का भाव मिला। 48 किलो गलके की बिक्री से 720 रुपए मिले। जबकि यही गलका खुले बाजार में 40 से 50 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बिक रहा है।
ऐसे समझें व्यापारियों के फायदे को
चिल्हर बाजार में इन दिनों खीरा 30 रुपए किलो बिक रहा है। किसान के खीरे की चिल्हर बाजार में 25 रुपए किलो बिक्री मान लिया जाए तो भी इसकी (418 किलो) कीमत 10 हजार 450 रुपए होता है। इसी तरह गलके की 40 रुपए किलो में भी चिल्हर बिक्री माना जाए तो 48 किलो के लिए 1 हजार 920 रुपए मिलेंगे। इस तरह मंडी के बाहर कई गुना मुनाफा कमाया जा रहा है।
सरकार किसान हितैषी होने का केवल ढोंग कर रही है। सब्जी उत्पादक किसानों को इतनी महंगाई के बाद भी लाभ नहीं मिल रहा है। सब्जियों का भी मूल्य निर्धारण कर एजेंट और बिचौलियों को हटाकर सीधे किसान और खरीदार के बीच खरीदी-बिक्री की व्यवस्था जरूरी है।
आईके वर्मा, प्रदेश अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ प्रगतिशील किसान संगठ
Published on:
19 Jul 2023 03:12 pm
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