28 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

नृत्य को सीखने मां को संघर्ष करना पड़ा, आज वहीं बन गई पहचान

नृत्यांगना गुरू संचियता भट्टाचार्य को बचपन में नृत्य सीखने जितना संघर्ष करना पड़ा उससे कही अधिक सफलता उन्हें मिली।

2 min read
Google source verification

भिलाई

image

Dakshi Sahu

Apr 19, 2018

patrika

भिलाई. ओडि़सी की जानी-मानी नृत्यांगना गुरू संचियता भट्टाचार्य को बचपन में नृत्य सीखने जितना संघर्ष करना पड़ा उससे कही अधिक सफलता उन्हें मिली। मां की प्रेरणा से वे ओडि़सी सीखने लगी तो पति पं. तरूण भट्टाचार्य ने उनकी नृत्य साधना में हमसफर बनकर साथ चले।

देश-विदेशों में प्रस्तुति के साथ शिक्षा दे रही संचयिता के लिए नृत्य अब समाजसेवा का माध्यम है। वे ओडि़सी के जरिए गरीब,अनाथ बच्चों के साथ-साथ ट्रांसजेंडर को आगे बढ़ाने के लिए कार्य कर रही है।

अहिल्या प्रसंग दिल के करीब
वे बताती हैं कि वे नृत्य में ज्यादातर महिला प्रधान प्रस्तुति देती है। खासकर अहिल्या का प्रसंग उनके दिल के सबसे करीब है। राम जन्म के हजारों वर्ष पहले अहिल्या ने अपने अधिकार की बात उठाई थी, आखिर वह सत्य के लिए पत्थर हुई थी, इसलिए प्रभू को भी उनको मोक्ष देने धरती पर आना पड़ा।

सती, द्रोपदी, कुंती पर आधारित कईप्रसंगों को भी मंच पर प्रस्तुत करती है। वे बताती है चीन सहित कई मुस्लिम देशों में भी अब भारतीय शास्त्रीय नृत्य को पसंद किया जाने लगा है। वे साल करीब चार शो विदेशों में ऐसी जगह करती है जहां पहली बार लोग इस नृत्य को देखा और सीखना भी चाहते हैं। यही वजह है कि विदेशों में भी उनकी शिष्याएं है जो उनसे नृत्य सीख रही है।

उसकी आंखों के आंसू बड़ा इनाम
संचयिता बताती हैं कि हजारों प्रस्तुतियों के बाद लोग उनकी तारीफ करते हैं पर सच्ची तारीफ तो उन्हें उस वक्त मिलती है जब ऐसा व्यक्ति जो नृत्य की बारीकियां नहीं जानता और उनकी परफार्मेस देखने के बाद नम आंखों के सामने आता है। वे बताती हैं कि ग्रामीण क्षेत्र में एक बार प्रस्तुति देने गई थी।

जहां एक काम करने वाली महिला उनके पास पहुंची और कहने लगी कि मेडम मुझे नृत्य की समझ नहीं है, लेकिन आपने जो किया उसे देखने के बाद मेरे आंसू नहींथम रहे मैनें द्रोपदी के दर्द को महसूस किया। उसकी बात सुनकर उन्हें लगा जैसे अब तक का सबसे बड़ा पुरस्कार उन्हें मिल गया। वे बताती हैं कि कईऐसे लोग हैं जिनकी आंखें द्रोपद्री चीरहरण के प्रसंग को नम हो जाती है।

उनका मानना है कि नृत्य सीधे हमें आध्यात्म से जोड़ता है। जिस तरह भगवान के दर्शन से पहले मंदिर के दरवाजे से होकर गर्भगृह में पहुंचना होता है नृत्यभी ठीक ऐसा ही है।नृत्य की साधना के बाद जब कलाकार परफार्मेस के लिएमंच पर आता है तो वह सीधे भगवान से जुड़ जाता है।