
कृष्ण जन्माष्टमी 30 अगस्त को, जानिए कैसे शुरू हुई भगवान कृष्ण को 56 भोग लगाने की परंपरा, क्यों माता यशोदा बनाती थी आठ पहर भोजन
भिलाई. राधे मोहन भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव यानी श्री कृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार इस साल 30 अगस्त को मनाया जाएगा। यह पर्व हर साल भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। ट्विनसिटी मिनी इंडिया भिलाई के कृष्ण मंदिरों में जन्माष्टमी की तैयारी अभी से शुरू हो गई है। वहीं भिलाई के अक्षय पात्र स्थित श्री राधाकृष्ण मंदिर में जन्माष्टमी पर 56 भोग भगवान (56 Bhog) को अर्पित करने के लिए सेवकों ने अभी से भोग बनाना शुरू कर दिया है। वैसे जन्माष्टमी पर दही हांडी और मटकी फोड़ का अलग ही मजा है इसके अलावा कोई चीज अगर इस पर्व को खास बनाता है तो वो है भपौराणिक ग्रंथों के अनुसार भगवान कृष्ण जब माता यशोदा और नंदलाल के साथ गोकुल में रहते थे तब उनकी मां यशोदा हर आठ पहर यानी दिन में आठ बार अपने हाथों से भोजन खिलाती थीं। एगवान कृष्ण को लगने वाला 56 भोग। कृष्ण जन्माष्टमी के दिन भक्त उपवास रखते हैं और कृष्ण जन्म के उपलक्ष्य में तरह-तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं। मध्य रात्रि में जन्म के बाद भगवान को नई पोशाक पहनाई जाती है और 56 भोग का प्रसाद लगाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर 56 भोग क्यों लगाया जाता है और इसकी परंपरा कब से शुरू हुईज्
दिन में आठ पहर भोजन बनाकर भगवान कृष्ण को खिलाती थी माता यशोदा
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार भगवान कृष्ण जब माता यशोदा और नंदलाल के साथ गोकुल में रहते थे तब उनकी मां यशोदा हर आठ पहर यानी दिन में आठ बार अपने हाथों से भोजन खिलाती थीं। एकबार ब्रजवासी स्वर्ग के राजा इंद्र की पूजा करने के लिए बड़ा आयोजन कर रहे थे। कृष्ण ने नंदलाल से पूछा कि आखिर यह आयोजन किस चीज के लिए हो रहा है। नंदलाल ने कहा कि यह देवराज इंद्र की पूजा के लिए आयोजन हो रहा है। इस पूजा देवराज प्रसन्न होंगे और अच्छी बारिश करेंगे, जिससे फसल अच्छी होगी।
कृष्णजी ने नंदलाल से कहा कि इंद्र का काम तो बारिश करना ही है तो उनकी पूजा क्यों हो रही है। अगर पूजा करनी है तो गोवर्धन पर्वत की करें क्योंकि इससे फल सब्जियां प्राप्त होती हैं और पशुओं को भी चारा मिलता है। तब सभी को कृष्ण की बात सही लगी और सभी ने इंद्र की पूजा न करके गोवर्धन की पूजा करना शुरू कर दिया। इंद्रदेव को यह बात अच्छी नहीं लगी, उनको यह अपना अपमान लगा। ब्रजवासियों की इस हरकत से उनको क्रोध आ गया।
गोवर्धन पर्वत को उंगली पर उठाया
ब्रजवासियों पर क्रोधित इंद्रदेव ने ब्रज में भयंकर बारिश कर दी। तेज बारिश की वजह से हर तरफ पानी ही पानी नजर आने लगा। ऐसा नजारा देखकर ब्रजवासी घबरा गए। तब कृष्णजी ने कहा कि इस बारिश से केवल गोवर्धन ही बचा सकते हैं। इसलिए उनकी शरण में चलिए, वही ब्रज को इंद्र के कोप से बचाएंगे। कृष्णजी ने कनिष्ठा उंगली से पूरे गोवर्धन पर्वत को उठा लिया और पूरे ब्रज की रक्षा की।
भगवान कृष्ण गोवर्धन पर्वत को सात दिन तक उठाकर रखा था और तब तक उन्होंने कुछ नहीं खाया-पिया था। आठवें दिन बारिश बंद हुई और सभी ब्रजवासी पर्वत के बाहर निकले। सभी ने सोचा कि कृष्ण ने सात दिन तक कुछ नहीं खाया-पिया और गोवर्धन पर्वत उठाकर हमारी रक्षा की है। तब माता यशोदा समेत सभी ब्रजवासियों ने कन्हैया के लिए हर दिन के आठ पहर के हिसाब से सात दिनों को मिलाकर कुल 56 प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन बनाए थे। 56 भोग में वही व्यजंन का इस्तेमाल किया जाता है, जो भगवान कृष्ण को पसंद हैं। तभी से भगवान कृष्ण को 56 भोग लगाने की परंपरा की शुरूआत हो गई।
हर तरह के फल और मिठाई से बनता है 56 भोग
ज्यादातर भक्त 56 भोग में 20 तरह की मिठाई, 16 प्रकार की नमकीन और 20 प्रकार के सूखे मेवे चढ़ाते हैं। लेकिन 56 भोग में माखन मिश्री, रबड़ी, पिस्ता, लड्डू, खीर, बादाम का दूध, रसगुल्ला, मठरी, जलेबी, चटनी, मूंग दाल का हलवा, मालपुआ, मोहनभोग, काजू, बादाम, इलायची, घेवर, चिला लौकी की सब्जी, बैंगन की सब्जी, पूरी, मुरब्बा, साग, पकौड़ा, खिचड़ी, दही, चावल, दाल, कढ़ी और पापड़ होते हैं। इस तरह कृष्ण जन्माष्टमी पर 56 भोग का प्रसाद लगाया जाता है। बाद में यह प्रसाद भक्तों को बांटा जाता है। कहते हैं जिसे 56 भोग का प्रसाद मिलता है वह बहुत भाग्यशाली होता है।
Published on:
24 Aug 2021 05:35 pm
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