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हर समय बच्चों को समझाने की जरूरत नहीं, उनकी बात सुन लेने से ही हल हो जाएगी आधी समस्या, बातचीत करते रहें

तुमसे नहीं हो पाएगा। तुम पढ़ते नहीं हो फेल हो जाओगे। यह वह शब्द है जो एक विद्यार्थी को अपने लक्ष्य से भटका सकते हैं। बार-बार ऐसे शब्द सुनकर वह बच्चा इसे सच मानकर बैठेगा। मेहनत छोड़ देगा। स्कूल हो या फिर कॉलेज शिक्षक यह बात अकसर कहते पाए जाते हैं।

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हर समय बच्चों को समझाने की जरूरत नहीं, उनकी बात सुन लेने से ही हल हो जाएगी आधी समस्या, बातचीत करते रहें

हर समय बच्चों को समझाने की जरूरत नहीं, उनकी बात सुन लेने से ही हल हो जाएगी आधी समस्या, बातचीत करते रहें

भिलाई . तुमसे नहीं हो पाएगा। तुम पढ़ते नहीं हो फेल हो जाओगे। यह वह शब्द है जो एक विद्यार्थी (student) को अपने लक्ष्य से भटका सकते हैं। बार-बार ऐसे शब्द सुनकर वह बच्चा इसे सच मानकर बैठेगा। मेहनत छोड़ देगा। स्कूल हो या फिर कॉलेज शिक्षक यह बात अकसर कहते पाए जाते हैं। भले ही उनकी मंशा गलत नहीं होती, लेकिन इन शब्दों से बच्चे का नुकसान हो सकता है। इसलिए शिक्षक निगेटिव एप्रोच (nigetive teacher aproch) छोड़ कर कक्षा में पॉजीटिव माहौल बनाएं। पते की यह बात हेमचंद यादव विश्वविद्यालय (Hemchand Univercity ) की कुलपति डॉ. अरुणा पल्टा (Aurna palta) ने कहीं। वे गुरुवार को पत्रिका और सचदेवा न्यू पीटी कॉलेज के पैरेंटिंग टुडे कार्यक्रम में बतौर अतिथि बोल रही थीं। वीसी ने कहा कि सिर्फ शिक्षक ही नहीं बल्कि पैरेंट्स भी इस आदत को बदल दीजिए। इस कार्यक्रम में दुर्ग जिले के शासकीय व निजी महाविद्यालयों के प्राचार्य व प्रोफेसर शामिल हुए।

खुद पर था भरोसा, तीसरी बार में बनीं वीसी
डॉ. अरुणा ने छोटा सा किस्सा शेयर करते हुए बताया कि यदि खुद की योग्यता पर भरोसा रखा जाए तो मंजिल जरूर मिलती है। उन्होंने कहा कि हेमचंद यादव विवि की कुलपति बनने से पहले उन्होंने दो बार अन्य विश्वविद्यालयों के लिए भी प्रयास किए थे, लेकिन उस समय चयन नहीं हुआ। इससे उन्होंने कभी हार नहीं मानी। बल्कि खुद की प्रोफाइल और मजबूत करती चली गईं। फेलवर से हार नहीं मानी।

कम टैलेंटेड बच्चा छोड़ता है अच्छी छाप
कुलपति डॉ. अरुणा ने कहा कि हर बच्चा कुछ खास करने के लिए बना है। आए दिन सोसाइटी में देखने को मिलता है कि दो बच्चों में जो कम टैलेंटेड रहा होगा, वही फैमिली को अधिक सपोर्ट करता है। जो पैरेंट्स कभी उसे हर बात के लिए फटकारा करते थे, वह उसी को बाद में तवज्जो देने लगते हैं। जब दो जुड़वा बच्चों में भी दोनों एक जैसे नहीं होते, एक होशियर और एक कमजोर होता है। ऐसे में उनकी तुलना करना समझदारी नहीं है। पैरेंट्स इस बात को मान लेंं।

इमोशनल इंटीलिजेंस पर काम करें प्रोफेसर
पैरेंटिंग टीम के एक्सपर्ट डॉ. किशोर दत्ता से सवाल हुआ कि आज के विद्यार्थी क्लास में कम हो सड़क पर प्रदर्शन करते अधिक नजर आते हैं। डॉ. दत्ता ने जवाब ने कहा, प्रोफेसरों को इमोशनल इंटीलिजेंट पर फोकस करना होगा। तभी वे विद्यार्थियों को सही मार्गदर्शन दे पाएंगे। जब विद्यार्थी शिक्षक के पास जाता है तो उसे उम्मीद रहती है कि यहां समाधान हो जाएगा। उसकी बात सुनी जाएगी। वास्तव में हम उनकी बातों को पूरी तरह सुने बिना ही उनका मार्गदर्शन करने में लगे रहते हैं। थ्योरी यह है कि हमें हर समय जवाब देने की जरूरत नहीं है। यदि हम उस बच्चे की बात पूरे ध्यान से सुन लें, तो आधी शिकायत वहीं दूर जाती है। बच्चे को लगता है कि मेरी बात सुनी गई, इसलिए वह आगे प्रदर्शन या विरोध की कभी नहीं सोचेगा।

बताया, कैसे कॉलेज दे सकता है प्लेसमेंट
डॉ. दत्ता ने कॉलेज में अध्ययनरत विद्यार्थियों के प्लेसमेंट की दिक्कत को दूर करने बढिय़ा आइडिया बताया। बोले, अपने विद्यार्थियों को रोजगार के बेहतर मौके दिलाने सामदाम दंड भेद की नीति अपनानी होगी। सबसे पहले कॉलेज सरकार के सहयोग से एक इंडस्ट्री कॉन्क्लेव कराएं। यदि कॉलेज अपने स्तर पर इंडस्ट्री को बुलाएगा तो वे न नहीं करेंगे, लेकिन यह एप्रोच शासन स्तर से हो तो उनको आना ही पड़ेगा। इवेंट में एचआर और एजुकेशन के लीडर्स आमने-सामने बैठकर यह हल निकालें कि कमी कहां है, उसे दूर करने के सुझाव उन्हीं एचआर से लिए जाएं। उनसे एक मोहलत लें कि इतने दिनों में हम आपके मुताबिक अपने बच्चों को तराश देंगे। ये वादा मिलेगा तो कंपनियां एक बार ही सही लेकिन डिग्री कॉलेजों में भी कैंपस प्लेसमेंट के लिए जरूर आएंगी।

हर बच्चे के लिए जरूरी है स्टार रेटिंग
इस कार्यक्रम में सचदेवा न्यू पीटी कॉलेज के डायरेक्टर व सर्टिफाइड पैरेंटिंग कोच चिरंजीव जैन बतौर एक्सपर्ट मौजूद थे। उन्होंने कहा कि सबसे पहले तो पैरेंट्स अपने बच्चों की स्किल डेवलप करने पर फोकस करें। बिना स्किल के कंपनी ५ हजार की सैलरी नहीं देती तो लाखों के पैकेज पर नौकरी क्यों देगी। अब वह दौर है जब बच्चे को खुद की कीमत को साबित करना होगा। जिस तरह हम सामान खरीदने से पहले उसकी रेटिंग जांचते हैं, ठीक वैसा ही प्रोफेशन के साथ होता है। एक विद्यार्थी को आगे बढऩे के लिए अपनी रेटिंग मालूम होना बहुत जरूरी है।

पैरेंट्स बच्चे के बैंक में खोले रिलेशनशिप अकाउंट
चिरंजीव जैन ने आगे कहा कि पैरेंट्स अपने ड्रीम्स बच्चों पर थोप देते हैं। बच्चा जितना डिजर्व करता है, उससे उतनी ही डिजायर भी होनी चाहिए। जिस तरह हम अपने बैंक अकाउंट में जितना डिपाजिट करेंगे, उतना ही विड्रॉल कर पाते हैं। ठीक वैसा ही बच्चों की पैरेंटिंग में भी होता है। यदि हम अपने बच्चे को बार-बार डिसापॉइंट कर रहे हैं। उसकी तुलना करते हैं या फिर हमें उसकी काबिलियत पर भरोसा नहीं है तो ऐसी स्थिति में उससे बेहतर नतीजे या संस्कार का विड्राल भी नहीं कर पाएंगे। इसलिए सबसे जरूरी है कि पैरेंट्स पहले बच्चे के साथ एक रिलेशनशिप अकाउंट खोलें। उसमें बच्चे के लिए प्यार और भरोसा डिपाजिट करें। बाद में उससे अच्छे नतीजे विड्रॉल करें।

बच्चों को बताएं संस्था का गौरवशाली इतिहास
पैरेंटिंग टीम एक्सपर्ट व पत्रिका भिलाई के स्थानीय संपादक नितिन त्रिपाठी ने स्कूल व कॉलेज के प्राचार्यों व प्रोफेसरों के सामने महत्वपूर्ण सुझाव रखे। उन्होंने कहा कि हर कॉलेज या स्कूल अपने विद्यार्थियों को संस्था का गौरवशाली इतिहास जरूर बताएं। उन्हें पता चलना चाहिए कि उनके स्कूल और कॉलेज ने नामी डॉक्टर, वैज्ञानिक, कुलपति जैसी हस्तियां दी हैं, जिन्होंने मेहनत से सफलता पाई है। जब बच्चे को ये सब नॉलेज होगा तो वह खुद ही उनकी तरह बनने की सोचेगा। एक बच्चा अपने पैरेंट्स से कहीं ज्यादा शिक्षक की बातों पर भरोसा करता है।

अब जानिए... प्राचार्य व प्रोफेसर्स का व्यू...

बच्चों में खत्म हुई पढऩे की आदत
विद्यार्थियों में पढऩे की आदत खत्म हो गई है। उनको सिर्फ विषय की किताबों से नाता रह गया है। कॉलेज और स्कूलों की लाइब्रेरी में कई अखबार आते हैं, लेकिन उन अखबारों को पढऩे के लिए विद्यार्थी नहीं आते। एक अच्छी किताब व अखबार विचार बदल सकते हैं। विद्यार्थियों में नकारात्मक चीजें बहुत ज्यादा घर कर रही हैं। इसे दुरुस्त करने पालकों और शिक्षकों को एकसाथ बच्चों पर मेहनत करनी होगी।
डॉ. एससी तिवारी, प्राचार्य, गल्र्स कॉलेज दुर्ग

खलनायक नहीं होते हैं पैरेंट्स
पैरेंट्स कभी भी खलनायक नहीं होते हैं। वे सिर्फ अपने बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए चिंता करते हैं। इसमें हर्ज ही क्या है। पैरेंट्स बढ़ा वेलविशर दूसरा कोई नहीं है। दरअसल, हममें भाषा और सुश्रुता खत्म हो गई है। सुश्रुता का मतलब होता है सुनना। आज के जमाने में सुनने कोई तैयार नहीं है, सभी सुनाने में लगे हुए हैं। बच्चों को भी यह समझना होगा कि अनुभव से बड़ा कुछ नहीं होता।
डॉ. महेशचंद्र शर्मा, प्राचार्य, उतई शासकीय कॉलेज

बच्चे से पहले पैरेंट्स सीखें लाइफ स्किल
आज के जमाने में पैरेंट्स अपने बच्चे को कामयाब इसलिए देखना चाहता है, ताकि वह उसकी कामयाबी से खुद को भी जस्टिफाई कर सकें। उनका बेटा बहुत बड़ा अधिकारी है यह बात उनके लिए स्टेट्स सिंबल जैसी है। भले ही बच्चा इसके लिए तैयार है या नहीं, इससे सरोकार अब कम ही है। मुझसे पूछें तो लाइफ स्किल(जीवन जीने की कला) बच्चों से पहले पैरेंट्स को सीखनी चाहिए।
डॉ. संध्या मदन मोहन, प्राचार्य, भिलाई महिला कॉलेज

बच्चों का ईगो लेवल बढ़ा
सोशल मीडिया और मोबाइल ने बच्चों को अकेला कर दिया है। वह लोगों के बीच नहीं जाना चाहते। विकल्प होना चाहिए कि वह बच्चा बाहर खेलने जाए। ग्रुप के साथ घुले-मिले। फेसबुक और इंस्टाग्राम पर जब कोई बच्चा पोस्ट डालता है तो उसका ध्यान आने वाले कमेंट्स पर रहता है। कमेंट अच्छे होते हंै तो सबकुछ ठीक, पर एक क्रिटिसाइज कमेंट उनकी दिशा भटका सकता है।
डॉ. रक्षा सिंह, प्राचार्य, श्रीशंकराचार्य कॉलेज

संगत तय करेगी अच्छा-बुरा
हमारे बच्चे अच्छे बर्ताव कर रहे हंै या बुरा यह उसकी संगत पर निर्भर करता है। बच्चा जब एडमिशन लेता है तो शुरुआत में तो कक्षा में दिखता है, लेकिन बाद में नदारद रहता है। दरअसल कई बच्चे एक साथ दो नाव पर सवारी कर चल रहे हैं। बीकॉम की पढ़ाई करने वाले ने प्रथम वर्ष में ही सीए की तैयारी शुरू कर दी है। इससे एक तरफ बेहतर तो दूसरी ओर नतीजों का खराब आना तय हो जाता है।
डॉ. वाईआर कटरे, प्राचार्य, कल्याण कॉलेज