
भिलाई. रसगोलकम्, तंदूल, शूपम, आद्रालू, पलादू, पक्रम, इस्थालिका, कलश:.. ऐसे कई सैकड़ों शब्द है जो अगले एक साल में हमें सुनाई देने वाले हैं। अब तक देवभाषा संस्कृत का चलन केवल किताबों और वेद पुराणों तक ही रह गया। पर अब जेवरा-सिरसा गांव में अगले एक साल के भीतर लोग संस्कृत में बात करने लगेंगे। इतना ही नहीं रोजमर्रा में उपयोग लाए जाने वाले शब्दों को भी संस्कृत में बोलेंगे।
गोद लेकर संस्कृत ग्राम बनाने का संकल्प
छत्तीसगढ़ संस्कृत विद्या मंडलम् ने इस गांव को गोद लेकर संस्कृत ग्राम बनाने का संकल्प लिया है। विद्यामंडलम् के सदस्य आचार्य नीलेश शर्मा ने बताया कि संस्कृत से ही हिन्दी की उत्पत्ति हुई है,लेकिन हम संस्कृत को भूला बैठे। ऐसे में मंडलम् की यह पहल इस भाषा को फिर से पहचान दिलाई जाएगी।
हम संस्कृत के करीब
हिन्दी सहित हमारी अन्य प्रादेशिक भाषाओं और संस्कृत के शब्दों में ज्यादा फर्क नहीं है। हम अपनी मातृभाषा के साथ-साथ संस्कृत को भी आसानी से अपना सकते हैं। जिस तरह अभिवादन में हम नमस्कार का उपयोग करते हैं उसी तरह संस्कृत में नमस्कारम् का उपयोग किया जाता है। मात्र एक या दो अक्षर के बदलाव को अपनाकर हम आसानी से संस्कृत को बोलचाल में शामिल कर सकते हैं।
चौपाल लगाकर करेंगे जागरूक
जेवरा सिरसा में संस्कृत विद्यामंडम् चौपाल लगाकर वहां के लोगों को संस्कृत सिखाएंगे। इसके लिए जिले के 183 संस्कृत शिक्षक और 30 स्कूल के संस्कृत जनभाषा केन्द्र के सदस्यों की मदद ली जाएगी। आचार्य नीलेश ने बताया कि गांव के सरंपच और पंचों से चर्चा हो चुकी है। अब वे लोगों को प्रेरित करेंगे कि घर हो या बिजनेस के होर्डिंग्स सभी में संस्कृत का प्रयोग करें। उन्होंने बताया कि करीब 6 महीने बाद गांव में संस्कृत का असर दिखने लगेगा।
प्रदेश में पहली बार लगी संस्कृत प्रदर्शनी
तीन दिनों से दुर्ग के नवीन मिडिल स्कूल में चल रही संस्कृत कार्यशाला में संस्कृत प्रदर्शनी लगाई गई। प्रदेश में पहली बार लगी। इस प्रदर्शनी में संस्कृत जनभाषा केन्द्र के शिक्षकों ने रोजमर्रा के उपयोग की चीजों के नाम संस्कृत में बताए और उसे बोलचाल में कैसे उपयोग में लाएं यह भी सिखाया। इस अवसर पर शिक्षकों ने तीन दिनों तक संस्कृत संभाषण पर विशेष प्रशिक्षण भी लिया। इस कार्यशाला के समापन अवसर पर छत्तीसगढ़ संस्कृत विद्यामंडलम् के अध्यक्ष स्वामी परमात्मानंद भी पहुंचे थे।
Published on:
28 Apr 2018 08:20 pm
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