
पुरुषों के वर्चस्व वाले ऑर्थोपेडिक सर्जरी में कदम रखने वाली छत्तीसगढ़ की पहली महिला डॉक्टर, पढि़ए सफलता की कहानी
दाक्षी साहू @भिलाई. सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले टीचर पिता टीआर चंद्राकर चाहते थे कि बेटी बड़ी होकर डॉक्टर बने। उस वक्त फीस ज्यादा और सैलरी बहुत कम हुआ करती थी। ऐसे में पिता ने अपनी बेटी को पढ़ाने के लिए बैंक से लोन ले लिया। बेटी ने भी पिता के सपनों को अपना बनाकर मेहनत करना शुरू किया। एक साल ड्रॉप के बाद आखिरकार दुर्ग की रहने वाली मधुलिका चंद्राकर श्रीवास्तव का सलेक्शन साल 2004 में सीजी पीएमटी में हो गया। बेटी का सफर यही नहीं थमा बेटी ने पिता का कर्ज अपने काबिलियत से उतारने की ठानी थी, इसलिए रूकी नहीं और पढ़ते चली गई। आज छत्तीसगढ़ की पहली और देश की 51 वीं महिला ऑर्थोपेडिक सर्जन (Orthopedic surgeon) बनकर पिता को और भी ज्यादा गौरवान्वित कर रही है। पुरुषों के वर्चस्व वाले ऑर्थोपेडिक सर्जरी के क्षेत्र को चुनने वाली डॉ. मधुलिका कहती है कि मैं जीवन में कुछ ऐसा करना चाहती थी जो इतिहास बन जाए। इसलिए ऐसे फील्ड को चुना जहां छत्तीसगढ़ की किसी महिला ने कदम नहीं रखा था। मेडिकल विशेषज्ञ भी ऑर्थोपेडिक सर्जरी को महिला डॉक्टरों के अनुकूल नहीं मानते थे। ऐसे में ढेरों चुनौतियों का सामना करने के बाद आखिकर खुद को साबित कर दिया। ये जीत सिर्फ मेरी नहीं आधी आबादी की थी जिसे लोग कमतर आंकते हैं।
साथी डॉक्टर कहते थे तुम्हारे बस की बात नहीं मधुलिका
एमबीबीएस के बाद जब मधुलिका ने पीजी एंट्रेस क्वालिफाई करके ऑर्थोपेडिक सर्जरी चुना तब साथी पुरुष डॉक्टर कहते थे कि ये तुम्हारे बस की बात नहीं। तुम्हें स्त्री रोग या फिर शिशु रोग विशेषज्ञ बनना चाहिए। क्या हड्डियों और मांस पेशियों के साथ जिंदगी भर जूझती रहोगी। मधुलिका ने न सिर्फ इस चैलेंज को स्वीकार किया बल्कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में महिला डॉक्टरों के लिए एक नया रास्ता भी खोला। कई क्रिटकल सर्जरी करने के बाद मुधलिका फिलहाल आदिवासी बाहुल्य जशपुर जिला अस्पताल में अपनी सेवाएं दे रही है।
फेल्यिर से टूट गई थी
डॉ. मधुलिका कहती है कि मैंने जीवन में कभी हारना नहीं सीखा था पर मेडिकल एंट्रेस के पहले अटेम्प्ट में असफल हो गई। टॉपर स्टूडेंट होने के नाते ये असफलता इतनी खली कि दो महीने तक डिप्रेशन में रही। किसी तरह पिता और परिवार के लोगों ने समझाया तब जाकर ड्रॉप इयर में सचदेवा कॉलेज भिलाई के डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर के मार्गदर्शन में दोबारा तैयारी शुरू की। आज जब खुद को इस मुकाम पर खड़ा हुआ देखती हूं तो सोचती हूं कि जीवन में हार का स्वाद भी जरूरी है, क्योंकि हार के बाद ही जीतने का जुनून बड़ जाता है। जब पुरुष प्रधान समाज किसी महिला को चुनौती देता है तो उसकी सफलता शोर मचाने के लिए काफी होती है।
Published on:
19 Apr 2021 05:50 pm
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