27 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

कलचुरी कालीन शिव मंदिर की कहानी, जहां छह महीने में पूरी हो जाती है हर मनोकामना

प्रसिद्ध कलचुरी कालीन शिव मंदिर में हर साल महाशिवरात्रि के दिन विशाल मेला का आयोजन होता है, उस दिन भगवान भोलेनाथ की पूजा करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु अपनी मनोकामना लेकर आते हैं।

2 min read
Google source verification
photo_6192617455671685772_y.jpg

भिलाई। छत्तीसगढ़ के जिला दुर्ग मुख्यालय से 22 किलोमीटर दूर बसे घनी आबादी वाले देवबलोदा गांव में एक प्राचीन शिव मंदिर है। इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां शिवलिंग स्वयं ही भूगर्भ से उत्पन्न हुआ है। बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण कलचुरी युग में 12वीं-13वीं शताब्दी में हुआ है और मंदिर का निर्माण एक ही व्यक्ति ने छमासी रात में की थी। यह पूरा मंदिर एक ही पत्थर से बना हुआ है और इसका गुम्बद आधा है।

पत्थरों से बना है प्राचीन मंदिर
प्राचीन शिव मंदिर पत्थरों से बना है। इन पत्थरों को चूना, गुड़ व अन्य सामग्री के मिश्रण से जोड़ा गया है। इसके हर पत्थर में मां दुर्गा, काली, गणेश व हाथी, घोड़े के अलावा अन्य पौराणिक कलाकृतियां देखने को मिलती हैं। मंदिर के पुजारी ने बताया कि पहले छह महीने सिर्फ एक व्यक्ति रात में यह मंदिर बनाता था। इस वजह से इसे छहमासी मंदिर कहा जाता है।

इस वजह से अधूरा रह गया मंदिर
गांव के जानकार बताते है कि शिल्पकार की पत्नी रोज खाना लेकर आती थी। एक दिन उसकी बहन खाना लेकर आई। कारीगर नग्न अवस्था में मंदिर का निर्माण कर रहा था। अपनी बहन को देखकर वह मंदिर के निकट स्थित कुंड में कूद गया। उसकी बहन मंदिर के पीछे स्थित तालाब में कूद गई। इस वजह से मंदिर के ऊपर गुम्बद का निर्माण नहीं हो पाया। मंदिर अधूरा रह गया। आज भी इसी हालत में लोग यहां दर्शन करने पहुंचते हैं।

मंदिर परिसर में है नाग नागिन का जोड़ा
बताया जाता है कि इस मंदिर प्रांगण में एक नाग-नागिन का जोड़ा भी है जो कई सालों में दिखाई पड़ता है। कई बार तो लोग इन्हें भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग में लिपटे हुए भी देखा गया है। लोगों का मानना है कि आज भी है नाग-नागिन का जोड़ा इस मंदिर में विचरण करते हैं। हालांकि अब तक यह नाग-नागिन के जोड़े से कभी किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है।

कभी नहीं सूखता मंदिर परिसर में बने कुंड का पानी
मंदिर प्रांगण के अंदर एक कुंड बना हुआ है। इस कुंड का पानी कभी नहीं सूखता और पानी कहां से आता है इसका स्रोत भी किसी को नहीं पता। ऐसा लोगों की मान्यता है कि कुंड के अंदर एक सुरंग है जोकि छत्तीसगढ़ के आरंग जिले में कहीं पर निकलता है। हालांकि यह सिर्फ मान्यता है इसका अब तक वैज्ञानिक या क्या पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिले हैं। कुंड के अंदर कई सालों से बहुत बड़ी-बड़ी मछलियां, कछुआ देखे जा सकते हैं। बताया जाता है कि कुंड के अंदर एक ऐसी मछली है जो सोने की नथनी पहनी हुई है और कई सालों में कभी-कभार ही दिखाई पड़ती है।

छह महीने में पूरी हो जाती है हर मनोकामना
इस प्राचीन मंदिर से लोगों की आस्था ऐसी है कि कोई भी मनोकामना छह महीने में पूरी हो जाती है। हर साल देशभर से करीब 2 से 3 लाख लोग दर्शन करने आते है। यहां पर महाशिवरात्रि में तीन दिनों का मेला भी लगता है। मेले के दौरान भक्तों की भीड़ दोगुनी हो जाती है।

महाशिवरात्रि में यहाँ लगता है विशाल मेला
हर साल महाशिवरात्रि के दिन यहां विशाल मेला भी लगता है। इस मेले को देवबलोदा का मेला भी कहा जाता है। दरअसल, उस दिन भगवान भोलेनाथ की पूजा करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु अपनी मनोकामना लेकर आते हैं और रात से ही भगवान भोलेनाथ की शिवलिंग की पूजा करने के लिए कतार में खड़े होते हैं। यह मेला 2 दिनों तक चलता है। पूरे गांव में मेला लगने से गांव की रौनक बनी रहती है।