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किस्सा छत्तीसगढ़ : जनसंघ के विशाल चंद्राकर खेत बेचकर लड़े थे चुनाव, कांग्रेस के फूलचंद बाफना से हारे

बात 1971-72 की बात है। विधानसभा चुनाव हो रहा था। भिलाई से जनसंघ ने अपना प्रत्याशी विशाल चंद्राकर को बनाया था। उनके पास चुनाव लडऩे के लिए पैसे तक नहीं थे। उन्होंने इसके लिए अपना खेत बेच दिया और डट कर चुनाव लड़ा।

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किस्सा छत्तीसगढ़ : जनसंघ के विशाल चंद्राकर खेत बेचकर लड़े थे चुनाव, कांग्रेस के फूलचंद बाफना से हारे

भिलाई@Patrika. बात 1971-72 की बात है। विधानसभा चुनाव हो रहा था। भिलाई से जनसंघ ने अपना प्रत्याशी विशाल चंद्राकर को बनाया था। उनके पास चुनाव लडऩे के लिए पैसे तक नहीं थे। उन्होंने इसके लिए अपना खेत बेच दिया और डट कर चुनाव लड़ा। उस दौर के चुनाव और आज के चुनाव में काफी अंतर है। आज के चुनाव में प्रत्याशी पहले की तुलना में ज्यादा खर्च करते हैं। पहले कार्यकर्ता और उनका परिवार प्रत्याशी के लिए खर्च करता था और उनका प्रचार भी करता था। हर कार्यकर्ता खुद को प्रत्याशी समझता था और प्रचार में जुट जाता था। चुनाव के दौरान रात-दिन बिना गेप किए काम में जुटा रहता था। इसके साथ जो कार्यकर्ता बीएसपी में नौकरी करते थे, वे अपनी ड्यूटी पर भी ईमानदार थे। रात-रात भर पोस्टर लगाना और वोटर पर्ची बनाने का काम घर-घर में होता था। पूरा परिवार इस काम को करता था। इसे घर-घर जाकर बांटते और जनसंपर्क करते थे। जनसंघ के प्रत्याशी को वोट देने की अपील करते थे। हमारे पास गाडिय़ों का साधन नहीं होता था। हम लोग पैदल या फिर साइकिल से प्रचार करते थे। इसके अलावा रिक्शा का साधन होता था। आज पार्टी की टिकट पाने के लिए मारामारी होती है। टिकट कटने या नहीं मिलने पर पार्टी से बगावत की स्थिति सामने आती है। उस दौर में लोग टिकट नहीं लेते थे और चुनाव लडऩे से मना कर देते थे। किसी को प्रत्याशी बनाने के लिए भी मशक्कत करनी पड़ती थी।

कार्यकर्ताओं को घर पर बनता था भोजन
कार्यकर्ताओं के घर से पूड़ी-सब्जी तैैयार होती थी और प्रचार में लगे सभी कार्यकर्ताओं के अलावा पोलिंग बूथ में बैठने वाले एजेंट के भोजन की व्यवस्था होती थी। सब यह मान कर चलते थे कि उनके घर में चुनाव हो रहा है। उस समय जितेंद्र सिंह के नाम के कार्यकर्ता थे, जो काफी दौड़-धूप करते। मतदान के दिन अपने कार्यकर्ताओं को खाने की व्यवस्था करने के साथ-साथ सरकारी कर्मचारियों का भी ख्याल रखते थे, उन्हें चाय-नाश्ता भी पूछते थे।

मतदान के दिन तो त्योहार की तरह मनाते थे
मतदान के दिन को किसी त्योहार की तरह लेते। अपना वोट डालने के बाद घर-घर जाकर लोगों से पूछते थे कि उन्होंने मतदान किया या नहीं। उन्हें वोट डालने के लिए कहते थे। उनसे यह भी कहते थे कि किसी को भी अपना वोट देना, लेकिन वोट जरूर दीजिए। कुछ ऐसे लोग भी मिलते थे कि जिनका कहना होता था कि आपके विरोधी ने तो हमें इतना दिया है, आप कितना देंगे। हमारा वोट फोकट का नहीं है, जो हम दे दें। विशाल चंद्राकर ने अपना खेत बेच कर चुनाव लड़ा। अपने विरोधी प्रत्याशी कांग्रेस के फूलचंद बाफना को जमकर टक्कर देते चुनाव हार गए।