
दुर्ग जिले में राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले वासुदेव जब पत्नी की जगह खुद प्रत्याशी बन गए
दुर्ग. जिले की राजनीति के चाणक्य... कांग्रेसी नेता स्व. वासुदेव चंद्राकर को यह उपाधि यूं ही नहीं मिली। रणनीति कौशल और राजनीतिक दांव-पेंच के बूते कई बार चुनावों में चौंकाने वाले परिणाम लाकर उन्होंने यह साबित भी किया। हालात यह थे चुनावों में किसी भी हाल में पार्टी की जीत की जिद में चंद्राकर बड़े नेताओं के निर्णयों को चुनौती देने से भी गुरेज नहीं करते थे। मध्यप्रदेशके दौर में पूर्व कृषि उपमंत्री अनंतराम वर्मा के बी-फार्म में नाम बदलकर पीसीसी अध्यक्ष भूपेश बघेल को चुनाव में उतारने के उनके फैसले को सभी जानते हैं, लेकिन बहुत ही कम लोगों को पता होगा कि पत्नी को प्रत्याशी बनाने के पार्टी के फैसले से असहमत चंद्राकर चतुराई से खुद चुनाव मैदान में उतर गए थे।
नाराजगी से बचने उनकी पत्नी बोधनी बाई को टिकट का प्रस्ताव रख दिया
बात पूर्ववर्ती मध्यप्रदेश के दौर में वर्ष 1985 के विधानसभा चुनावों की है। वासुदेव चंद्राकर वर्ष 1980 के चुनाव में जीत दर्ज कर मध्यप्रदेश विधानसभा में अर्जुन सिंह सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। तब तक मुखर व्यक्तित्व के कारण चंद्राकर जिले के साथ प्रदेश की राजनीति में भी मजबूत पैठ बना चुके थे। संभवत: उनकी बढ़ती दखल तब भोपाल में एकाधिकार रखने वाले नेताओं को रास नहीं आ रही थी, इसलिए वर्ष 1985 के चुनाव में हार की संभावना जताते हुए उन्हें टिकट देने से इनकार कर दिया गया, लेकिन जिले की दूसरी सीटों पर उनके प्रभाव को देखते हुए नाराजगी से बचने उनकी पत्नी बोधनी बाई को टिकट का प्रस्ताव रख दिया। चंद्राकर बड़े नेताओं की रणनीति समझ गए, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। उन्होंने पत्नी बोधनी बाई का नामांकन भरा और जमा कराया। इसके साथ ही खुद भी डमी कैंडिडेट के रूप में नामांकन दाखिल किया। बाद में बोधनी बाई का नामांकन रद्द हो गया और चंद्राकर स्वत: ही कांग्रेस के कैंडिडेट बन गए।
तब था डमी कैंडिडेट का प्रावधान
तब चुनाव में कैंडिडेट को अब की तरह नामांकन में कमी अथवा त्रुटि होने पर अफसरों द्वारा बताकर सुधार करवाने का प्रावधान नहीं था। इससे नामांकन रद्द हो जाने की आशंका ज्यादा रहती थी। इसे देखते हुए पार्टियों में डमी कैंडिडेट से नामांकन भरवाने का विकल्प रखा जाता था।
नहीं थे पार्टी के निर्णय से सहमत, छोड़ दिया कॉलम खाली
चंद्राकर को पत्नी की जीत को लेकर आशंका थी, इसके अलावा गृहिणी होने के कारण क्षेत्र के दौरे को लेकर परेशानी हो सकती थी। इसलिए वे उनके चुनाव लडऩे पर सहमत नहीं थे। इसलिए संभवत: उन्होंने जानबूझकर नामांकन में कोई कॉलम खाली छोड़ दिया।
Updated on:
28 Oct 2018 06:46 pm
Published on:
28 Oct 2018 06:46 pm
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