
युवा दिवस: ये हैं छत्तीसगढ़ के सबसे कम उम्र के डिप्टी कलेक्टर, गांव में हुई पढ़ाई, 12 वीं तक तो पता ही नहीं था कैसे बनते हैं अफसर...
कोमल @धनेसर भिलाई. छत्तीसगढ़ के बालोद जिले का छोटा सा गांव अवारी। जहां पढऩे के लिए सिर्फ हिन्दी मीडियम के सरकारी स्कूल और उस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को यह तक नहीं पता होता कि राज्य की पीएससी (CG PSC) परीक्षा क्या होती है। पर गांव के बेटे दिलीप उइके ने 21 वर्ष की उम्र में पहले ही प्रयास में राज्य सेवा आयोग की परीक्षा पास कर दिखा दिया कि मन में कुछ कर दिखाने का विश्वास हो तो राहें आसान होती चली जाती है। सबसे कम उम्र में डिप्टी कलेक्टर बने दिलीप अब उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा बन गए हैं जो प्रशासनिक सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं।
डिप्टी कलेक्टर पद पर हुआ चयन
दिलीप बताते हैं कि उन्हें 12 वीं तक पता ही नहीं था कि यूपीएससी और पीएससी जैसे भी कोई एग्जाम होते हैं। पहली बार गांव से निकलकर जब उन्होंने दुर्ग के साइंस कॉलेज में दाखिला ले सरकारी आदिवासी हॉस्टल से बीएससी की पढ़ाई शुरु की तो कॉलेज में आने वाले अधिकारियों को देखा और तब प्रोफेसर्स ने बताया कि अधिकारी बनने क्या करना होता है। बस उसी दिन ठान लिया कि वे अधिकारी बनकर रहेंगे। पर इसकी तैयारी कैसे करनी होगी कुछ पता नहीं था। धीरे-धीरे कुछ सीनियर से पूछा तो कभी प्रोफेसर्स की मदद ली। कॉलेज की लाइब्रेरी में किताबों का साथ मिला और सबसे ज्यादा मोबाइल में ऑनलाइन लेक्चर और नोट्स की मदद से उन्होंने फस्र्ट इयर से ही परीक्षा की तैयारी शुरू की। फाइनल आते-आते पहली बार पीएससी का फार्म भरा। पहले प्री, फिर मेंस और इंटरव्यू के बाद जब मैरिट लिस्ट आई तो उनका चयन डिप्टी कलेक्टर की पोस्ट पर हुआ था।
लॉकडाउन में मिला मौका
दिलीप बताते हैं कि कॉलेज को दो साल तो उन्होंने बीएससी के साथ-साथ पीएससी की भी तैयारी की, लेकिन जब लॉकडाउन लगा तो कॉलेज भी बंद हो गए, हॉस्टल भी बंद हो गए। तब उन्होंने दुर्ग में ही किराए का मकान लिया और लॉकडाउन के वह चंद महीने कमरे में रहकर अपने लैपटॉप और मोबाइल के सहारे पढ़ाई की। दिनभर अच्छी वेबसाइट सर्च कर कभी पीडीएफ डाउनलोड किया तो कभी ऑनलाइन लेक्चर सुनकर नोट्स बनाई। वे बताते हैं कि एक सरकारी स्कूल का छात्र होने के नाते उनकी अंग्रेजी भी उतनी खास नहीं थी, लेकिन ऑनलाइन नोट्स के जरिए उन्होंने इस कमजोरी को भी दूर किया।
मेरा सपना आदिवासी बच्चों को मिले मौका
दिलीप बताते हैं कि उनके पिता सन सिंह उइके किसान है। मां भी उनका खेती करने में हाथ बंटाती है। वे सब यही मान बैठे थे कि अपनी मर्जी की पढ़ाई के बाद वे खेत ही संभालेंगे। पर दुर्ग आकर उन्हें नई दिशा मिली। वे पीएससी की तैयारी कर रहे थे और उन्हें जब बेहतर मार्गदर्शन नहीं मिल पाता था, तो वे अक्सर सोचते थे कि जब वे अफसर बनेंगे तो अपने समाज के युवाओं के लिए ऐसा कुछ करेंगे कि वे उच्च शिक्षा हासिल करें और उन्हें पता हो कि उनके अधिकार क्या है। पीएससी का रिजल्ट आने के बाद वे अपने इस मिशन में जुट गए हैं। कुछ दिनों बाद उनकी पोस्टिंग भी आ जाएगी, लेकिन इन दिनों वे दुर्ग के सरकारी आदिवासी हॉस्टल में युवाओं के साथ ही रह रहे हैं और उन्हें पीएससी की तैयारी भी करा रहे हैं। वे बताते हैं कि कई युवा उनसे ऑनलाइन भी जुड़कर मार्गदर्शन ले रहे हैं और उन्हें वे ऑनलाइन भी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करा रहे हैं।
चार बातों ने बदली जिंदगी
दिलीप का मानना है कि इन चार बातों ने उनकी जिंदगी की दिशा बदली। हमेशा ऊंचे सपने देखना, सपनों के लिए नॉलेज लेते रहना, खुद पर विश्वास और पिछली गलतियों को स्वीकार उसे सुधारना.. इस पर अमल कर वे आज पहले ही प्रयास में अपने सपनों को पूरा कर पाए।
Published on:
12 Jan 2022 12:01 pm
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