
87 वर्षीय निहाल दिनभर अपने बेटे पवन की सूचना केंद्र स्थित दवा की दुकान पर बैठकर मदद करते हैं और शाम को घर पर भवई नृत्य सिखाते हैं।
भीलवाड़ा।
अभी वृद्ध होने का समय नहीं आया है। बुढे वो होते है जिनका मन-मानस थक जाता है और खाली बैठे समय बिताते हैं। मेरे पास तो खाली समय है ही नहीं। मैं अभी भी नाच रहा हूं और नई पीढी को भी सीखा रहा हूं। यह कहना है आमलियों की बारी के रहवासी निहालचन्द अजमेरा का। 87 वर्षीय निहाल दिनभर अपने बेटे पवन की सूचना केंद्र स्थित दवा की दुकान पर बैठकर मदद करते हैं और शाम को घर पर भवई नृत्य सिखाते हैं।
वे रोज शाम को सिर पर 36 कलश लेकर भवई नृत्य में इस कदर डूब जाते है कि न उम्र याद रहती है और ना ही समय। रात साढे आठ बजे बाद परिवार के सदस्य भी उनका साथ देते हैं क्योंकि निहालचन्द्र सबसे ज्यादा उम्र और सबसे ज्यादा कलश के साथ भवई करने वाले नर्तक के रूप में विश्व रिकॉर्ड बनाना चाहते हैं। वैश्य समाज में जन्मे निहाल कहते है कि मेरे समाज में नृत्य-संगीत को अच्छा नहीं माना जाता लेकिन माता के संगीतज्ञ होने से उन्हें इससे प्यार हो गया।
इस कला को आगे बढाने के लिए वर्ष 1954 में संगीत कला केन्द्र की स्थापना करने में शामिल था। वर्ष 1956 में उन्होंने संगीत में एमए किया। तब संगीत के क्षेत्र में इक्क-दुक्के ही आते थे। उन्होंने भारतीय लोक कलामण्डल उदयपुर के संस्थापक पदम श्री देबीलाल सामर की प्रेरणा से इस कला को आगे बढाया। उनके निर्देशन में गैर नृत्य शुरू कराया। 35 साल संगीत कला केन्द्र में भी बच्चों को संगीत सिखाया।
पोती को पहुंचाया लिम्बा बुक तक
77 वर्ष की उम्र में उन्होंने भवई नृत्य की कला को जिन्दा रखने का बीड़ा उठाया। शुरू में सिर पर थोड़े कलश रख अभ्यास किया। पिछले दस वर्ष से वह अपने सिर पर लगातार कलशों की संख्या बढा रहे है। निहालचन्द्र अभी 36 कलश सिर पर लेकर नृत्य का अभ्यास कर रहे हैं। उन्होंने पोती वीणा को भी संगीत सिखाया और संगीत नाटक अकादमी का पुरस्कार दिलाया। लिम्का बुक में वीणा का नाम दर्ज हुआ।
तीन बार इंडिया बुक ऑफ रिकॉड्र्स में नाम दर्ज
इंडिया बुक ऑफ रिकॉड्र्स ने सन् 2012 में निहालचन्द का नाम उम्रदराज नर्तक के रूप में शामिल किया। सबसे उम्रदराज व सर्वाधिक कलश लेकर नृत्य करने वालों के रूप में मान्यता दे दी। सन् 2017 तक तीन बार उनका नाम इण्डिया बुक ऑफ रिकार्ड में दर्ज हुआ। अजमेरा को 2009 में कला पुरोधा सम्मान भी मिल चुका है। सन् 2014 में जयपुर में मंत्री अरुण चतुर्वेदी ने वयोवृद्ध सम्मान से नवाजा। सिंगापुर, लंदन, बैंकाक, नेपाल में भवई प्रस्तुत कर चुके। राजस्थान संगीत नाटक अकादमी ने सन् 2009 में संस्कृति जगत की सुदीर्ध सेवा तथा भावी पीढी को प्रेरित कर कला परम्परा को सुरक्षित रखने के लिए कला पुरोधा सम्मान दिया।
Updated on:
12 Mar 2018 01:06 pm
Published on:
12 Mar 2018 01:03 pm
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