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झूठ को त्याग कर, करें सच्चाई की साधना

आचार्य महाश्रमण ने दिया तेरापंथ में प्रवचन

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झूठ को त्याग कर, करें सच्चाई की साधना

झूठ को त्याग कर, करें सच्चाई की साधना

भीलवाड़ा।
आचार्य महाश्रमण ने कहा कि दुनिया में सच्चाई जीवित है तो दुनिया में झूठ भी चलता है। शास्त्रकार ने झूठ के दस कारण बताए हैं। इसमें सबसे पहला कारण है-गुस्सा। आदमी गुस्से में कई बार झूठ बोल जाता है। आदमी गुस्से में स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख पाता है। न करने वाला काम भी कर देता है। शत्रु को मित्र और मित्र को शत्रु बता देता है। आदमी दूसरा झूठ अहंकार में बोलता है। कई बार आदमी निर्धन होते हुए भी स्वयं को धनवान बताता है। ऐसा वह अपने अहंकार के वशीभूत होकर बोल देता है। तीसरा झूठ आदमी माया के वशीभूत होकर बोलता है। चौथा झूठ आदमी लोभ के कारण से बोलता है। ऐसा झूठ आदमी आर्थिक संदर्भों में ज्यादा बोलता है। पांचवा झूठ आदमी प्रेम के वशीभूत होकर भी बोलता है। छठा झूठ आदमी वैर भाव या द्वेष भाव के कारण से बोलता है। सातवां झूठ आदमी हंसी-मजाक में भी बोल देता है।
कई बार आदमी भय के कारण भी झूठ बोल देता है। किसी डांट से बचने, कहीं मार खाने अथवा सामाजिक बेइज्जती होने के भय से भी आदमी झूठ बोल देता है। कई बार आदमी किसी कहानी को रोचक बनाने के लिए भी कुछ अतथ्यात्मक बातें जोड़ देता है, वह भी झूठ का एक प्रकार है। आचार्य ने कहा कि आदमी कई बार किसी को पीड़ा पहुंचाने, उसे कष्ट देने के लिए बोलता है, यह झूठ का दसवां कारण है। कोई चोर नहीं है तो भी उसे अचोर कहना अथवा किसी सच्चाई के राह पर चलने वाले को बदमाश कह देना। आदमी को झूठ से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी पूर्ण रूप से झूठ का त्याग न कर सके तो भी कुछ अंशों में अथवा जितना हो सके, उतना झूठ से बचने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार आदमी झूठ को छोड़ सच्चाई की साधना करने का प्रयास करना चाहिए।