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अरना-झरना बना लोक संस्कृति एवं पर्यटक स्थल

दस एकड़ जमीन में बना संग्रहालय, 250 से अधिक विभिन्न प्रजातियों के पेड़

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अरना-झरना बना लोक संस्कृति एवं पर्यटक स्थल

भीलवाड़ा।

पहाड़ी क्षेत्र, चारों तरफ हरियाली। मनोरम झरना। पक्षियों का कलरव। विभिन्न प्रजातियों के वृक्ष और सुरम्य वातावरण। यह स्थान है जोधपुर के रूपायन संस्थान का लोकवाद्य यंत्र , लोक कला ज्ञानशोध व विकास केन्द्र अरना-झरना। प्रसिद्ध लोककला मर्मज्ञ पद्मश्री कोमल कोठारी की ओर से पन्द्रह वर्ष पहले स्थापित यह संग्रहालय वर्तमान में देश विदेश में नाम कमा चुका है।

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यह पर्यटक स्थल जोधपुर से 23 किमी दूर मोकलावास गांव के पास है। यहां पहुंचने के लिए तीन सुगम रास्ते हैं। पद्मश्री कोमल दा के पुत्र कुलदीप कोठारी इस केन्द्र को पर्यटक स्थल बनाने के लिए लगे है। संग्रहालय दस एकड़ जमीन पर बना है। पास ही अरनेश्वर महादेव मंदिर है, जहां बरसात में झरना बहता है। इसी के नाम पर इस संग्रहालय को अरना-झरना कहा जाता है। संग्रहालय की सीमा पर बनी दीवार के पास एक तलैया है। इसे कभी रायमल तालाब के नाम से जाना जाता है। संग्रहालय के सुन्दर और सुरम्य स्थान को देखकर यह कल्पना करना कठिन है कि यह जमीन कभी पत्थरों के टुकड़ों से भरी थी।

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पौधों की 250 प्रजातियां
अरना-झरना केन्द्र की स्थापना वर्ष 2002-03 में की गई थी। इसकी नींव लोककला मर्मज्ञ कोमल कोठारी ने रखी थी। उनके पुत्र कुलदीप बताते हैं कि उस समय यह इलाका पूरी तरह उजाड़ और पथरीला था। इसे सरसब्ज बनाने के लिए इसमें मक्का, बाजरा व ग्वार की खेती की गई। इस जमीन पर खेजडी, कैर, बैर, रोहिडा, कुम्बड जैसे 250 प्रकार के पौधे लगाए गए थे, जो आज विशाल रूप ले चुके हैं। संग्रहालय की हरियाली देखकर अब किसी को विश्वास ही नहीं होता कि कभी ये जगह उजाड़ रही होगी। यह केन्द्र झाड़े का संग्रहालय भी है। यहां के पेड पौध व फसलों से 200 से भी अधिक तरीके के झाडू बनाए गए है। जिन्हें दिखने के लिए आस-पास के दर्जनों गांव के लोग आते है।


पांच दर्जन से अधिक पुराने वाद्ययंत्र
यहां वाद्ययन्त्रों का संग्रहालय आकर्षक है। यहां पुराने वाद्ययन्त्रों को संजोकर रखा गया है। पांच दर्जन से अधिक वाद्ययन्त्रों की इतिहास सहित पूरी जानकारी है। इन्हें देखने पर्यटक की नहीं, जोधपुर, जैसलमेर के विद्यालय के छात्र भी आते हैं। मनोरंजन के लिए कठपुतली केन्द्र बनाया गया है। मिट्टी व कागज से बने बर्तन अपने आप में आर्कषक है। विभिन्न पुस्तकें व संस्कृति से जुड़े लोकगीतों का संग्रहालय है। खास बात यह है कि भीलवाड़ा जिले के शाहपुरा की चित्रकारी का समावेश देखने को मिलता है।


सरकार से सहयोग की अपेक्षा
पर्यटक स्थल को ओर विकसित करने के लिए भामाशाहों व सरकार के सहयोग की महती अवश्यकता है। यहां बने संग्रहालय में कई ऐसी वस्तु है, जिसे देखने के लिए कई लोग आते हैं।
कुलदीप कोठारी, सचिव अरना-झरना, जोधपुर