
एमजीएच: लॉन्ड्री में धुलती है चद्दरें ताकि संक्रमण की आशंका न रहे
भीलवाड़ा. मरीज को इलाज के साथ साफ सुथरा वातावरण दिलाने के लिए महात्मा गांधी चिकित्सालय प्रयास कर रहा है। एमजीएच, एमसीएच और टीबी अस्पताल के इंडोर में अब हर बेड की चद्दर मैकेनिकल लॉन्ड्री में धोई जाती है ताकि संक्रमण का खतरा नहीं रहे।
अस्पताल प्रबंधन यहां वार्डों में अच्छी क्वालिटी की बेडशीट इस्तेमाल कर रहा है। प्रतिदिन अलग रंग की चद्दरें बिछाई जा रही है। जनाना अस्पताल (मातृ एवं शिशु इकाई) में सतरंगी चद्दर काम में ली जा रही है। प्रतिदिन रंग अलग होने से चद्दर की पहचान हो पाएगी कि यह बदली गई है या नहीं। चद्दर बदलने का काम सभी वार्डो में किया जा रहा है। चद्दरों को धोने के लिए 35 लाख की लागत से ऑटोमेटिक मशीनें लगाई गई है। इन मैकेनिकल लॉन्ड्री में चद्दर धुलने व सूखने के बाद प्रेस होकर निकलती है। एमजी अस्पताल में सफेद, गुलाबी, नीला, ग्रीन, येलो, औरंज तथा बैंगनी कलर की 700-700 चद्दरें है। इनको वार के अनुसार बिछाया जाता है।
धुलाई से सुखाई तक
एमसीएच के पीछे मैकेनिकल लॉन्ड्री में तीन तरह की मशीनें है। इसकी कीमत लगभग 35 लाख रुपए है। एक मशीन में एक साथ 50 से 60 चद्दरों की धुलाई हो सकती है। दूसरी मशीन में इतने चद्दरों को ड्राई किया जाता है। एक अन्य मशीन में एक-एक चद्दर प्रेस के साथ बाहर निकलती है। इस काम के लिए एक ही परिवार के पांच सदस्य लगे हैं।
बहाना नहीं चलेगा
अभी अस्पतालों में सफेद छोटी चद्दर बिछती है। वार्डों में थोड़े समय में मैली कुचली लगने लगती थी। छोटी होने के कारण बेड पर मरीज के करवट बदलते ही अस्त व्यस्त हो जाती थी। अब ऐसा नहीं होगा। प्रबंधन ने बड़ी साइज की विभिन्न रंग की चद्दरें खरीदी है। हर वार को अलग रंग की चद्दर बिछाएंगे। स्टाफ चद्दर बदलने का बहाना नहीं बना पाएगा।
अस्पताल के बाहर नहीं धुलेगी
अब तक अस्पताल प्रबंधन चद्दरों की धुलाई के लिए कार्मिकों को सोड़ा, साबुन, ब्लीचिंग व अन्य चीजें दे रहा था। कार्मिक भी सीएमएचओ कार्यालय के बाहर खुले मैदान में चद्दरों की धुलाई करते थे। उन्हें जमीन पर ही सुखाते थे। अब मैकेनिकल लॉन्ड्री लगने के बाद बाहर खुले में धुलाई बंद हो गई है। इससे संक्रमण का खतरा भी समाप्त हो गया है।
Published on:
09 Sept 2023 11:13 am
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