जिले में 100 से अधिक चिमनी तथा 400 से अधिक साधारण ईंट भट्टे हैं। इन भट्टों पर काम करने वाले लोग परिवार के साथ भट्टों पर ही रहते हैं। वहां बच्चों की पढ़ाई-लिखाई बंद कर काम पर लगा लेते हैं। एक भट्टा मजदूर ने बताया, वे भट्टे पर कई महीने पहले से अपने घर से रहने आ जाते हैं। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई कराए भी तो कैसे? उनके बच्चे भी काम में हाथ बंटाते हैं। तब जाकर साल भर के खाने का काम चल पाता है। वह भट्टे पर काम के लिए भट्टे मालिक से हजारों रुपए पेशगी के लेते हैं। इससे कर्ज चुका भट्टे पर आ जाते हैं। भट्टे पर ईंट बनाने का काम ठेके पर करते हैं। बच्चे हाथ बंटाते हैं। एक मजदूर ने बताया कि बच्चों की पढ़ाई के बारे में सोचे या कर्ज उतारने की जुगत करें। जिले में कई भट्टों पर इसी तरह के परिवार जीवन-यापन करने के लिए बच्चों सहित काम में लगे हुए हैं। इनके बच्चों के लिए भट्टों के पास ही स्कूल भी खोले हैं, लेकिन कुछ दिन बच्चे स्कूल जाते है, फिर बन्द कर देते हैं।
भीख मांग बिगड़ रहा भविष्य