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भीलवाड़ा: संत-साध्वियों पर हमले दुर्भाग्यपूर्ण, इनकी सुरक्षा का जिम्मा सरकार व समाज का

साध्वी इन्दुप्रभा से बातचीतसमन्वयवादी व अनेकान्तवादी सोच ही खोल सकती जैन एकता की राह
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भीलवाड़ा

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Suresh Jain

•

Updated: 17 Jul 2023, 11:03 AM IST

भीलवाड़ा: संत-साध्वियों पर हमले दुर्भाग्यपूर्ण, इनकी सुरक्षा का जिम्मा सरकार व समाज का

भीलवाड़ा: संत-साध्वियों पर हमले दुर्भाग्यपूर्ण, इनकी सुरक्षा का जिम्मा सरकार व समाज का

भीलवाड़ा. चन्द्रशेखर आजादनगर के रूप रजत विहार में चातुर्मास कर रही साध्वी इन्दुप्रभा श्रमण संघीय परम्परा की वरिष्ठ साध्वियों में शुमार है। भीलवाड़ा में चौथी बार चातुर्मास कर रही इन्दुप्रभा का मानना है कि जैन संत-साध्वियों पर हमले दुर्भाग्यपूर्ण है। इनको रोकने का जिम्मा सरकार व समाज का है। जैन एकता की राह में अपने ही पंथ को श्रेष्ठ मानने की सोच बड़ी बाधा है। साध्वी से विभिन्न मुद्दों पर बातचीत के मुख्य अंश-


प्रश्न- जैन संतों पर हमले की घटनाएं बढ़ी है?
उत्तर- संत हो या साध्वी, समाज की धरोहर है। उन पर हमला दुर्भाग्यपूर्ण है। संयम जीवन की साधना करने वाले संत-साध्वी चाहे किसी भी पंथ, परम्परा के हो उनकी रक्षा करना समाज व सरकार दोनों का कर्तव्य है।
प्रश्न- जैन एकता की बात तो बहुत होती है लेकिन हो नहीं पाती?
उत्तर- हर पंथ,परम्परा व गच्छ स्वयं को श्रेष्ठ मानता है। कोई भी अपनी मान्यता व आस्था के मामले में झुकने को तैयार नहीं होता है। इसी कारण जैन एकता संभव नहीं हो पा रही है। समन्वयवादी व अनेकान्तवादी सोच ही एकता की राह खोल सकती है।
प्रश्न- चातुर्मास के नाम पर आडंबर व प्रदर्शन बढ़ रहा है?
उत्तर- चातुर्मास यानी जैन संत किसी एक स्थान पर निर्धारित समय बिताए। धर्म साधना करें और श्रावक-श्राविकाओं को भी धर्म संदेश देकर इससे जोड़े। चातुर्मास जप, तप व भक्ति के लिए होता है। इसके नाम पर किसी तरह का आंडबर व दिखावा नहीं होना चाहिए।
प्रश्न- बच्चों व युवाओं को धर्म से जोड़ने के लिए क्या कर सकते हैं?
उत्तर- ऐसा नहीं है कि बच्चे व युवा धर्म से कट गए हैं। कई बच्चे व युवा अब भी स्थानक आते हैं। जो बच्चे प्रवचन व धार्मिक कार्यक्रमों में नहीं आते है उनको जोड़ने के लिए संस्कार पाठशालाएं श्रेष्ठ माध्यम हो सकती है। माता-पिता को भी बच्चों को धर्मस्थान पर जाकर संत-साध्वी दर्शन की प्रेरणा देनी चाहिए।
प्रश्न- जैन दीक्षा लेने वालों की संख्या घट रही है?
उत्तर- जब बच्चे धर्म से जुड़ेंगे ही नहीं तो उनमें संयम जीवन स्वीकार करने की भावना कहां से आएगी? धर्म से जुड़ेंगे तो संयम जीवन का महत्व समझेंगे और भाव भी उत्पन्न होंगे। सीमित परिवार व एक बच्चा कल्चर से माता-पिता बच्चों को संयम पथ से जोड़ने में हिचकने लगे हैं।
प्रश्न- हर स्तर पर मोबाइल का चलन बढ़ गया है?
उत्तर- मोबाइल के युग में लोग दिन भर उसी में बिजी रहते है। ऐसे में कई लोग स्थानक जाकर धर्म आराधना के लिए समय नहीं होने का तर्क देते हैं। मोबाइल के बढ़ते चलन के दुष्परिणाम भी समाज में देखने में आ रहे हैं। मोबाइल का सीमित उपयोग समय की जरूरत बन गया है लेकिन मोबाइल हमारी भक्ति व आस्था के स्वरूप को विकृत नहीं कर दे ये भी देखना होगा।