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ब्रश ने उतार दिया मूंज की कूंची का रंग

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Brush unloaded the munj ki kuchi ke rang in bhilwara

Brush unloaded the munj ki kuchi ke rang in bhilwara

भीलवाड़ा।


पांच साल पहले गांव हो या शहरी क्षेत्र हर जगह के घर व दुकानों तथा प्रतिष्ठानों पर कल्ली का उपयोग करते थे। इसके उपयोग के लिए मूंज की बनी कूंची काम में लेते थे। अब शहर समेत ग्रामीण क्षेत्रों में भी कल्ली छोड़ कलर, डिस्टेम्पर तथा प्लास्टिक पेंट करने लगे है। यही वजह है कि दीपावली पर्व की नजदीकी होने के साथ ही कलर पेन्ट्स की दुकानों पर लोगों की चहलकदमी बढऩे लगी है। मूंज की कूंची व ब्रश खरीदने के लिए अब कम ही लोग सिरकी मोहल्ले का रुख करते हैं। इससे कंूची व मुड्डे बनाने वाले परिवारों के सामने अब रोजगार का संकट खड़ा हो गया है।

अब नहीं खरीदते कूची
मुकेशकुमार मुछाल ने बताया कि उत्तरप्रदेश से मूंज मंगवाकर इसको लकड़ी के गट्टे से कूटकर कंूची व ब्रश तैयार किया जाता है। कंूची २५ रुपए तथा ब्रश २० रुपए में बेचते हैं। अब ग्राहक नहीं के बराबर हैं। दीपावली पर केवल इन्हें सजाने का काम रह गया है। पिछले १५ दिन में केवल दो कूची ही बिक पाई।

इसलिए पड़ा सिरकी मोहल्ला नाम
मुछाल ने बताया कि पहले हर घर में छाया के लिए लोग सिरकी लगाते थे। सिरकी बनाने के काम में सौ से भी अधिक परिवार लगे रहते थे। अब एसी व कूलर के प्रचलन के आगे सिरकी के खरीदार नहीं रहे। सिरकी के लिए ही नाम सिरकी मोहल्ला पड़ा। हालांकि अब भी कुछ महिलाएं खस की टाटी बनाती हैं। इसके अलावा मुड्डे, टोकरी बनाते हैं। अब ये सभी समाप्त से हो गए हैं। खस की टाटी २० रुपए प्रति वर्गफीट के आधार पर बनाई जाती है।

कच्चे घरो में गोबर व मिट्टी का चलन
ग्रामीण क्षेत्रो में गिने-चुने कच्चे (मिट्टी) के घर बचे हैं। कच्चों इन घरों में ही गोबर व पीली मिट्टी की लिपाई व खडि़या मिट्टी और पांडू से पुताई की जाती थी। इसके बाद हड़मच से मांडने बनाए जाते थे। अब पक्के घर बनाने से लिपाई खत्म हो गई है।