scriptGovernment sleeps with monsoon farewell, now will celebrate Van Mahots | मानसून विदाई के साथ खुली सरकार की नींद, अब मनाएंगे वन महोत्सव | Patrika News

मानसून विदाई के साथ खुली सरकार की नींद, अब मनाएंगे वन महोत्सव

मानसून की विदाई के बाद सरकार की अब नींद खुली है। सरकार के फरमान के बाद वन विभाग की ओर से गांधी जयंती पर दो अक्टूबर से वन महोत्सव मनाने की तैयारी की जा रही है, जबकि पौधों की वृद्धि करने में अमृत माने जाने वाला वर्षाकाल समाप्त हो गया है। बरसात के समय वन महोत्सव का आयोजन नहीं कर, इसकी तिथि आगे खिसका देने से अफसरों की कार्य प्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं।

भीलवाड़ा

Updated: September 23, 2022 11:31:01 am

मानसून की विदाई के बाद सरकार की अब नींद खुली है। सरकार के फरमान के बाद वन विभाग की ओर से गांधी जयंती पर दो अक्टूबर से वन महोत्सव मनाने की तैयारी की जा रही है, जबकि पौधों की वृद्धि करने में अमृत माने जाने वाला वर्षाकाल समाप्त हो गया है। बरसात के समय वन महोत्सव का आयोजन नहीं कर, इसकी तिथि आगे खिसका देने से अफसरों की कार्य प्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं। पर्यावरण के जागरूकों का मानना है कि बरसात ही चली गई, अब वन महोत्सव मनाने का क्या औचित्य रहेगा।
मानसून विदाई के साथ खुली सरकार की नींद, अब मनाएंगे वन महोत्सव
मानसून विदाई के साथ खुली सरकार की नींद, अब मनाएंगे वन महोत्सव

लाखों पौधे रोपने का दावा, हकीकत कुछ और
भीलवाड़ा जिले में इस वर्षाकाल में वन विभाग की ओर से 4 लाख 40 हजार तथा अन्य एजेंसी और संस्थाओं के साथ मिलकर करीब दस लाख पौधे रोपने का दावा किया गया। पर्यावरण के जानकार सवाल उठा रहे हैं कि आखिर हर वर्ष लाखों की संख्या में पौधे रोपे जाते हैं और तो इसका असर व्यापक पैमाने पर दिखाई क्यों नहीं देता। जितनी संख्या में पौधे रोपे जाने का दावा किया जाता रहा है, यदि वे पौधे वृक्ष का आकार ले लें तो शहर समेत पूरा जिला जंगल की तरह दिखने लगेगा। दरअसल में हकीकत में पौधरोपण में खानापूर्ति हो रही है। अभियान के बीच बहुत सारे आंकड़े कागजों पर तैयार होते हैं और इसके साथ ही रोपे गए पौधों की देखभाल न होने के कारण ज्यादातार पौधे नष्ट हो जाते हैं।

लाखों पौधे रोपने का दावा, हकीकत कुछ और
भीलवाड़ा जिले में इस वर्षाकाल में वन विभाग की ओर से 4 लाख 40 हजार तथा अन्य एजेंसी और संस्थाओं के साथ मिलकर करीब दस लाख पौधे रोपने का दावा किया गया। पर्यावरण के जानकार सवाल उठा रहे हैं कि आखिर हर वर्ष लाखों की संख्या में पौधे रोपे जाते हैं और तो इसका असर व्यापक पैमाने पर दिखाई क्यों नहीं देता। जितनी संख्या में पौधे रोपे जाने का दावा किया जाता रहा है, यदि वे पौधे वृक्ष का आकार ले लें तो शहर समेत पूरा जिला जंगल की तरह दिखने लगेगा। दरअसल में हकीकत में पौधरोपण में खानापूर्ति हो रही है। अभियान के बीच बहुत सारे आंकड़े कागजों पर तैयार होते हैं और इसके साथ ही रोपे गए पौधों की देखभाल न होने के कारण ज्यादातार पौधे नष्ट हो जाते हैं।
अब मात्र खानापूर्ति जैसा रहेगा महोत्सव
वन विभाग अक्टूबर माह में वन्य जीव सप्ताह के साथ इस वन महोत्सव का आयोजन करेगा। दरअसल में वन विभाग अन्य सरकारी एजेंसियां, सामाजिक व स्वयंसेवी संस्थाओं और भामाशाहों के साथ मिलकर हर साल वन महोत्सव मनाता रहा है। यह वन महोत्सव बारिश के साथ ही शुरू हो जाता है। अमूमन जुलाई माह में महोत्सव मनाया जाता है। महोत्सव के दौरान लाखों की संख्या में पौधे रोपे जाते हैं। रोपे गए पौधे वर्षाकाल में रफ्तार पकड़ते हैं। बाद में यह पौधे वृक्ष बनते हैं और ऑक्सीजन हब के रूप में काम करते हैं। लेकिन इस बार वर्षाकाल के बाद महोत्सव मनाकर विभाग मात्र खानापूर्ति कर रहा है।
अब औचित्यहीन

बारिश शुरू होने पर जिला स्तरीय वन महोत्सव मनाया जाना चाहिए। बारिश के अभाव में यह पौधे जिस अवस्था में जीवित रहने चाहिए और बढऩे चाहिए उतने नहीं रह पाएंगे। बरसात में ही पौधे आगे बढ़ते हैं। मानसून लौट जाने के बाद महोत्सव मनाने से विभाग के प्रति जनता में गलत संदेश जाएगा। अब महोत्सव मनाना पूरी तरह औचित्यहीन है।
-बाबूलाल जाजू, पर्यावरणविद
पौधों को पानी पिलाकर मनाएंगे महोत्सव
वन महोत्सव मानसून में नहीं मनाया गया। इस बार वन्य जीव सप्ताह के साथ ही वन महोत्सव मनाया जाएगा। योजना में थोड़ा परिवर्तन करते हुए मानसून के बाद पौधों को पानी की जरूरत होती है। इसलिए पौधों को पानी देने के लिए वन महोत्सव मनाया जाएगा।
- वीरभान ओला, उपवन संरक्षक, वन विभाग, भीलवाड़ा

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