
Inspection became a formality, school security is dependent on teachers
झालावाड़ दुखांतिका ने झकझोर दिया है। यह हादसा पहली बार नहीं हुआ, जब बच्चों की सुरक्षा को लेकर प्रशासन की लापरवाही उजागर हुई हो। भीलवाड़ा जिले के कई सरकारी स्कूल ऐसे भवनों में संचालित हो रहे हैं, जो कभी भी हादसे का शिकार हो सकते हैं। सवाल यह है कि जब शिक्षा के मंदिर ही सुरक्षित नहीं, तो बच्चों का भविष्य कौन सुरक्षित करेगा?
कचौरी व चाय पीकर लौट जाते है अधिकारी
एक स्कूल के शिक्षक ने बताया कि मुख्यालय से अधिकारी निरीक्षण करने आते है। कचौरी,चाय-बिस्किट का नाश्ता कर लौट जाते हैं। उन्हें बिल्डिंग को देखने की फुर्सत तक नहीं होती। जर्जर भवन की रिपोर्ट का जिम्मा भी प्रिंसीपल को दिया जाता जबकि कुछ अधिकारी तो ऐसे हैं कि प्रिंसीपल निरीक्षण की रिपोर्ट तैयार कर अधिकारियों के घर पहुंचते हैं और हस्ताक्षर कराकर ले आते हैं। हर साल स्कूल भवनों की स्थिति को लेकर रिपोर्ट मांगी जाती है और यह शाला दर्पण पोर्टल पर अपलोड भी की जाती है, लेकिन उन रिपोर्ट्स की कोई सुध नहीं लेता। कई स्कूलों में बरसात के दिनों में पानी भर जाता है। इससे पढ़ाई ठप हो जाती है। इसी का नतीजा झालावाड़ जैसी भयाभय घटना सामने आई।
निरीक्षण के दौरान फॉर्मेट भी नहीं भरा जाता
निरीक्षण के दौरान अधिकारियों को एक फॉर्मेट भरना होता है। इसमें उनको भवन, एमडीएमसी, शिक्षकों के पद, शौचालय एवं भवन संबंधी जानकारी भरनी होती है। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर निरीक्षण की स्थिति महज खानापूर्ति वाली ही रही तो बच्चों की जिंदगी कैसे सुरक्षित होगी।
अभिभावकों की चिंता
- जीविलया स्कूल तीन साल से जर्जर है। हर दिन डर लगता है कि कहीं कोई हादसा न हो जाए। हम अपने बच्चों को पढ़ने भेजते हैं पर मन हमेशा आशंका से घिरा रहता है।
- महेंद्र जाट, अभिभावक, जीविलया
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय गल्यावड़ी रायपुर स्कूल के कमरे जर्जर है। कई बार अधिकारियों को अवगत कराया, लेकिन आज तक किसी ने ध्यान नहीं दिया। बारिश के दौरान टपकती छत में विद्यार्थियों को बैठना पड़ रहा।
- माधू लाल जाट, अभिभावक, गल्यावड़ी
Published on:
28 Jul 2025 09:01 am
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