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Bhilwara जानिए भीलवाड़ा की अंदर की बात

@ Know the inside story of Bhilwara शहरी बाशिंदों की याददाश्त तगड़ी है, अच्छी हो या बुरी बात, आसानी से नहीं भूलते है। मैडम जी तीन साल बाद शहर में आई तो उनका पुराना जख्म ताजा हो गया, चर्चा है कि नेताओं ने रोड शो के दौरान मैडम के साथ उनकी लग्जरी गाड़ी में शहर की सैर की और इशारे ही इशारों में अपनी बात रख दी, लेकिन यहां भी मैडम जी ने चतुराई दिखाई और सिर्फ मुस्करा कर रह गई।
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भीलवाड़ा

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Narendra Kumar Verma

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Updated: 29 Nov 2021, 11:41 AM IST

Know the inside story of Bhilwara

Know the inside story of Bhilwara

Know the inside story of Bhilwara भीलवाड़ा। शहरी बाशिंदों की याददाश्त तगड़ी है, अच्छी हो या बुरी बात, आसानी से नहीं भूलते है। मैडम जी तीन साल बाद शहर में आई तो उनका पुराना जख्म ताजा हो गया, मैडम जी के आने की खबर मात्र से ही अधिकांश ने फोन घनघना दिए और यह सुझाव भी दे डाला की मैडम जी से यह जरुर पूछ लेना की अब तो हमारा शहर गंदा तो नजर नहीं आता है, हमने भी इस सवाल का जवाब उनसे टटोलने की पूरी कोशिश की, लेकिन वह सवालों के जवाबों के मामले में मीडिया से दूर ही रही। एमएलए व सभापति भी इसी सवाल का जवाब मैडम से ही जानने के इच्छुक थे, लेकिन उन्हें भी सीधे इस सवाल का जवाब नहीं मिला। चर्चा है कि दोनों नेताओं ने रोड शो के दौरान मैडम के साथ उनकी लग्जरी गाड़ी में शहर की सैर की और इशारे ही इशारों में अपनी बात रख दी, लेकिन यहां भी मैडम जी ने चतुराई दिखाई और सिर्फ मुस्करा कर रह गई।

हाथ मिले, दिल नहीं

जिला खुश है, कांग्रेस की खुशी का तो ठिकाना नहीं है, एक दशक बाद केबिनेट मंत्री मिलने के बाद जिले में विकास की गंगा बहाने के ताने बाने भी बुनने लगे है। गहलोत ने वफादारी का बड़ा ईनाम देकर अपनी तरफ से कोई कमी नहीं छोड़ी, इतना ही नहीं अपनी चांखेड यात्रा के दौरान पुराने दोस्तों के बीच जो मनमुटाव दिख रहा था, उसे भी हाथ मिलवा कर दूर कर दिया, लेकिन चर्चा यह खास है कि हाथ जरुर मिल गए है, लेकिन शायद दिल अभी तक नहीं मिले है, संभवत: यही कारण है कि बधाई संदेशों में वो ही चेहरा नजर नहीं आ रहा है, जिसे नजदीक लाने के जतन किए गए।

यह लाइजनर है बड़े काम के

शहर का कद, जिस प्रकार से बढ़ता जा रहा है, उससे अच्छे संकेत मिल रहे है, चर्चा है कि शहर के विकास एवं बढ़ते कदमों के पीछे लाइजनरों के बड़े हाथ है, यह लाइजनर छोटे-मोटे नहीं है, वरन इनके रासूकात बड़े लोगों, मंत्रियों, वरिष्ठ अधिकारियों के साथ है। दिल्ली व जयपुर तक इनकी लाइजनिग की डोर बंधी है। कलक्ट्रेट, यूआईटी, नगर परिषद, जिला परिषद में तो इनके बिना पत्ता तक नहीं हिलता है। खास चर्चा तो यह है कि आला अधिकारियों के आने जाने, अटके काम कराने, बड़े प्रोजेक्टों को कैसे लिया जाता है या कराया जाता है, यह सब इन लाइजनरों का ही खेल है।

अब नोटिस की किसे परवाह

कोरोना संकट काल में सरकारी महकमों में हर किसी की मौज ही रही है, यह मौज की लत्त अभी तक नहीं छूटी है। खास कर सरकारी शिक्षण संस्थाओं में तो बिगड़ा ढर्रा अभी तक नहीं सुधर सका। चर्चा है कि शहर के गल्र्स कॉलेज में पढ़ाई के नाम पर सिर्फ हाजिरी का खेल हो रहा है, यहां शिकायतें बढ़ी तो संस्था प्रधान एक मैडम जी को नोटिस थमाने से नहीं चूके, लेकिन नोटिस की भी यहां परवाह नहीं की गई।

चुप्पी में ही भलाई

नए टाइगर आ गए है, लेकिन उनकी दहाड़ अभी तक सुनाई नहीं दी गई, उनकी चुप्पी की थानों से लेकर राजनीतिक गलियारे में चर्चा होने लगी है, सभी अपने अपने स्तर पर उनकी खामोशी के मतलब निकाल रहे है। चर्चा है कि जिले में पुलिस महकमे के हालात दूध से जले जैसे बने हैं, ऐसे में अब यहां छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीने की ही कवायद हो रही है।
- नरेन्द्र वर्मा