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Bhilwara: बड़े भाई राधे के ‘बोन मैरो’ से मिला कृष्णा को नया जीवन, ‘उम्मीद का चेहरा’ बनकर लौटा घर

Thalassemia Success Story: माता-पिता के लिए अपने बच्चे को हर महीने अस्पताल के बेड पर लेटे और नसों में खून चढ़ते देखना किसी सजा से कम नहीं होता। देवेंद्र और लक्ष्मी देवी धोबी ने पिछले 10 सालों से इसी दर्द को जिया है।

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स्वस्थ होकर घर लौटा कृष्णा परिजनों के साथ, पत्रिका फोटो

स्वस्थ होकर घर लौटा कृष्णा परिजनों के साथ, पत्रिका फोटो

Thalassemia Success Story: माता-पिता के लिए अपने बच्चे को हर महीने अस्पताल के बेड पर लेटे और नसों में खून चढ़ते देखना किसी सजा से कम नहीं होता। देवेंद्र और लक्ष्मी देवी धोबी ने पिछले 10 सालों से इसी दर्द को जिया है।
उनका बेटा कृष्णा 'थैलेसीमिया' जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहा था, जहां जीवन की डोर केवल नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन (रक्त चढ़ाने) पर टिकी थी। लेकिन अब कृष्णा के घर में खुशियों का दीया जल रहा है। कृष्णा अब न केवल स्वस्थ है, बल्कि थैलेसीमिया जैसी लाइलाज मानी जाने वाली बीमारी को मात देकर अपने घर लौट आया है।

ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन जांच शिविर ने बदली किस्मत

आरके कॉलोनी निवासी कृष्णा की जिंदगी में उम्मीद की पहली किरण तब दिखी, जब रक्त भामाशाह विक्रम दाधीच की प्रेरणा से एक निजी हॉस्पिटल में निशुल्क ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन जांच शिविर लगाया गया।
किस्मत ने तब साथ दिया जब रिपोर्ट में पता चला कि कृष्णा का बोन मैरो उसके बड़े भाई राधे से पूरी तरह मैच कर गया है। माता पिता ने कभी सोचा नहीं था कि घर का ही एक बच्चा दूसरे के लिए जीवनदाता बन जाएगा।

महीनों का संघर्ष और डॉक्टर का करिश्मा

जयपुर के महात्मा गांधी अस्पताल की डॉ. प्रिया मारवाह और उनकी टीम ने इस जटिल चुनौती को स्वीकार किया। 10 सितंबर को कृष्णा का बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया गया। ऑपरेशन के बाद का समय सबसे कठिन था कृष्णा को 6 महीने तक जयपुर में पूरी तरह आइसोलेट रहना पड़ा ताकि संक्रमण का कोई खतरा न रहे।
इस मुश्किल सफर में राजस्थान सरकार की चिरंजीवी बीमा योजना और 'कविता कैंसर सेंटर जयपुर' के सहयोग ने आर्थिक बोझ को कम किया, जिससे एक गरीब परिवार का सपना सच हो पाया। बड़े भाई राधे से मिले बोन मैरो से कृष्णा को नए जीवन का मानों तोहफा मिला है।

समाज की एकजुटता से मिली कामयाबी

कृष्णा की इस जीत के पीछे थैलेसीमिया रिलीफ सोसायटी की चेयरपर्सन एकता ओस्तवाल और गौतम दुग्गड़, समर्पण फाउंडेशन के आलोक जाजू, संदीप मेहता और मोहम्मद सलमान के सामूहिक प्रयास और दक्षिण पूर्व एशिया थैलेसीमिया संस्थान का पूरा सहयोग रहा। स्वस्थ होकर लौटा कृष्णा उन हजारों थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के लिए 'उम्मीद का चेहरा' बनकर लौटा जो आज भी इलाज की राह देख रहे हैं।