
हाथ उपर कर बोले लिछमणजी : सब भगवान की माया है, ऊ जस्यां राखि ऊस्यां रेवां, चोंच दी तो चुग्गो भी ऊ ही देई
कानाराम मुण्डियार
भीलवाड़ा.
एक काश्तकार अपनी फसल की बुआई से लेकर कटाई व उतराई तक कितनी मेहनत करता है। यह खुद किसान या उसका परिवार ही जान सकता है। तमाम तरह की मुश्किलों का सामना करने के बावजूद किसान को कभी घबराया या हिम्मत हारा नहीं देखा। फसलों पर कीटों के प्रकोप हो या अनावृष्टि, अतिवृष्टि, ओलावृष्टि जैसी मुश्किलें आनी की बात हो, किसान हमेशा खेतों में डटा रहता है।
किसी भी कारोबार या रोजी-रोटी के धंधे पर जुटे कामगारों की तुलना में खेती-किसानी का काम करने वालों से ज्यादा कोई हिम्मतवाला नहीं है। यह देखना या करीब से जानना है तो इन दिनों बेमौसम बरसात से चौपट हुई फसलों के बीच खड़े किसानों से बात करके ही देख लीजिए। भीलवाड़ा जिले के मांडलगढ़ क्षेत्र के एक खेत में लिछमणजी की मिसाल भी उनमें एक ही है।
राजस्थान पत्रिका टीम बीगोद त्रिवेणी से आगे बढ़कर खाचरोल गांव पहुंची तो यहां सड़क किनारे खेत में लिछमणजी काम करते मिले। उनके परिवार के अन्य सदस्य भी मूंगफली व मक्के की फसल को उतारने में लगे थे। चूंकि कुछ दिन पहले खेत में पानी भर गया था। इसलिए फसल के बीच पैर रखने से पैर मिट्टी में धंस रहे थे। बमुश्किल दूसरी तरफ मेड़ के पास खड़े लिछमणजी के पास पहुंचे तो वो नंगे पैर काम कर रहे थे।
उन्हें पूछा कि आपके जूते कहां है तो बोले, जूता तो रिप्या वाळा पहने, गरीब कटु लावैं सा। नुकसान का पूछा तो बोले, म्हारे भाया के चार-पांच बीघा की सगळी फसळां चौपट होगी। मूंगफली और मक्की में भी घणो नुकसान होग्यो। उन्होंने मूंगफली का पौधा उखाड़कर दिखाया और बोले, यो देखो, इम्हे कतरी मुफल्यां बची, जो दाणौ आयो यो भी गळ ग्यो। कई में तो कीड़ा पड़ ग्या, तो खाली रेगी। अब ई फसल मूं कस्यां घर चलांवा। दीपावली त्योहार कैसे मनाएंगे के सवाल पर दोनों हाथ उपर करते हुए बोले, सब भगवान की माया है, ऊ जस्यां राखि ऊ स्यां रेवां, चोंच दी तो चुग्गो भी ऊ ही देई।
बड़े दिल के किसान के कलेजे को सलाम-
किसान लिछमणजी के इस आत्मबल को देखकर सहज अंदाजा लगा सकते हैं कि वाकई एक किसान का कलेजा कितना बड़ा होता है। खून-पसीने की पूरी मेहनत पर पानी फिरने के बाद भी उनका दर्द चेहरे पर नहीं झलक रहा था। वो हमें अपना पूरा खेत दिखाने के लिए मेड़ पर लेकर चलने लगे। कांटों व खरपतवार के बीच हम संभलकर कदम बढ़ा रहे थे। लेकिन वो नंगे पैर के बावजूद गति से चल रहे थे। उनका संतुलन गजब का था। खेत की मेड़ पर हमारे एक साथी की शर्ट कंटीली झाड़ी में अटक गई तो वो पलटकर कांटा निकालने लगे। उन्हें खेत में आए मेहमान यानि हमारी चिन्ता थी। पूरे दिन के ट्यूर में हमें लिछमणजी की वह सहजता एवं अपनापन याद आता रहा और जब-जब हम किसी खेत के करीब से गुजरेंगे तो लिछमणजी याद जरूर आएंगे।
बेमौसम बरसात से नुकसान : किसान व सरकारी आंकलन
भीलवाड़ा-
फसलें : मक्का, कपास, ज्वार, सोयाबीन, मूंगफली
किसान: 60 प्रतिशत
सरकारी: 5 से 50 प्रतिशत
चित्तौडग़ढ़-
फसलें : ज्वार, मक्का, उड़द, मंूगफली, कपास व अन्य।
किसान- 70 प्रतिशत
सरकारी- 20 से 25 प्रतिशत
प्रतापगढ़-
फसलें : मक्का, सोयाबीन व अन्य
किसान: 70 प्रतिशत
सरकारी: 50 से 60 प्रतिशत
Published on:
18 Oct 2022 10:26 pm

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