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झाड़ू का संग्रहालय, जिसे देखने आते हैं परदेस से लोग

200 से अधिक तरीके की झाड़ू उपलब्ध

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झाडू का संग्रहालय

भीलवाड़ा ।

झाडू का संग्रहालय, सुनकर भले ही अजीब लगे जोधपुर के रुपायन संस्थान का लोकवाद्य यंत्र , लोक कला ज्ञानशोध व विकास केन्द्र अरना-झरना में एेसा है। जोधपुर से 23 किमी दूर जैसलमेर मार्ग पर मोकलावास के पास अरना -झरना संग्रहालय में राजस्थान की विभिन्न जातियों के दैनिक जीवन की संस्कृति की झलक संजोयी गई है। इसमें पहली प्रायोजना झाड़ू पर केंद्रित है।

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राजस्थान के सुदूर क्षेत्रों से एकत्रित झाडू बनाए गए। प्रयोग से जुड़ी जानकारी उपलब्ध है। झाड़ू बनाने की विधियां और उपयोग, जुड़ी मान्यता व धारणा तथा मिथकों को एक सूत्र में पिरोया गया है। संग्रहालय में झाड़ू प्रदर्शनी के माध्यम से विभिन्न विधाओं को जोडऩे का प्रयास है। यह संग्रहालय विश्व के तेजी से बदलते अर्थतंत्र के प्रति भी सजग है। एक ऐसा मंदिर भी है जहां केवल झाडू ही चढ़ाया जाता है। इसे देखने देस-परदेश से लोग आते हैं।

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वजह यह
यह न तो कलाकृति है और न ऐतिहासिक महत्व की वस्तु लेकिन पदमश्री कोमल कोठारी (कोमलदा) ने झाड़ू को अपने संग्रहालय में केंद्रीय स्थान दिया। संग्रहालय में २०० तरह के झाड़ू बने हैं। अरना-झरना के सचिव कुलदीप कोठारी ने कहा,महिलाएं व पुरूष आसपास पाई जाने वाली पत्तियों, टहनियों, सींकों और बचे-खुचे सामान से झाड़ू बनाती है। संग्रहालय में प्रदर्शित अधिकांश झाड़ू की बनावट, आकार और सामग्री के आधार पर इनकी विविधता में कमी नहीं है।


अंदर-बाहर की झाड़ू भी अलग
झाड़ू दो वर्गों में बांट रखे है। एक में घर के बाहर प्रयोग और दूसरे में घर के अंदर इस्तेमाल होने वाले। घरों के अंदर काम आने वाले झाड़ू पन्नी, कांस और सेवन जैसी नाजुक घासों या पत्तियों से बनाए गए। ताकि किसी के पैरों में न आए। इसलिए आमतौर पर इन्हें चारपाई के नीचे या दरवाजे के पीछे लिटा कर रखा जाता है।
मंदिरों और पूजा स्थलों के अंदर सफाई करने के लिए मोर पंख से बने झाड़ू प्रयुक्त होते हैं। आंगन, गोशाला, मैदान, सड़क, फुटपाथ जैसी सतह साफ करने वाले झाडू़ भुंगरा, बुहारो, बुहारा, बारो, खुआरा, हावारनो और हवेनो कहलाते हैं। खुली जगहों की सफाई के लिए झाड़ू सिणिया और खींप की झाडिय़ों से बनाए जाते हैं। ये झाड़ू हाथ से बनाते है। घुमक्कड़ बंजारा जाति मूंझ और पन्नी घास से झाड़ू बनाती है। दक्षिण भारत से आए प्रवासी कोली समुदाय के लोग खजूर की झाड़ू बनाते हैं। हरिजन समुदाय बांस की पन्नी का झाड़ू बनाता है। कई बार झाडू बनाते समय दात तक टूट जाते है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं। ज्यादात्तर झाडू पैर के अंगूठे व दांत के माध्यम से ही बनाए जाते है।