
भीलवाड़ा मे ओवरब्रिज बनाने की दिशा में अब नए सिरे से बढ़ाएं कदम
भीलवाड़ा. टेक्सटाइल सिटी भीलवाड़ा में रोजाना के जाम से निजात के लिए एक और ओवरब्रिज (आरओबी) चाहिए। शहरवासी भी सुगम कनेक्टिविटी के लिए आरओबी का निर्माण चाहते हैं। एनजीटी की आरओबी पर रोक भी नहीं है। अब बड़ा सवाल यह है कि आखिर वह कौन है, जिसने आरओबी निर्माण में प्रभावित होने वाली एक संस्था के ट्रस्टियों ने मिलकर अपने यहां काम करने वाले मजदूर को एनजीटी में पुलिया निर्माण के खिलाफ खड़ा कर दिया। हालांकि वह मजदूर संस्था में केवल गायों की देखभाल करता था।
अहम सवाल है कि एनजीटी के 11 सितम्बर 2017 के उस आदेश की नगर परिषद के किन अधिकारियों ने गलत व्याख्या की, जिसकी आड़ लेकर शहर के यातायात को सुचारू करने की योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। इससे एक कंपनी का पुलिया निर्माण का खर्च बच गया। एनजीटी ने 11 सितम्बर 2017 के आदेश में पूछा था कि कितने पेड़ कटेंगे, लेकिन अधिकारियों की समीक्षा रिपोर्ट पेश नहीं करने से वाद ही निष्पादित कर दिया गया।
अपील को ऐसे किया खारिज-
एनजीटी के वाद निष्पादित करने के बाद नगर परिषद ने वर्ष 2018 में सर्वोच्च न्यायालय में अपील की। न्यायालय ने 23 अप्रेल 2018 को अपील खारिज कर दी। शीर्ष अदालत ने एनजीटी के आदेश को बरकरार रखा। कहा कि एनजीटी ने कोई निर्णय नहीं दिया। एनजीटी ने नुकसान की रिपोर्ट मांगी थी। इस प्रकरण को पूरी तरह से समाप्त करने के लिए एक कंपनी ने एनजीटी दिल्ली में अपील की। एनजीटी ने एक व्यक्ति के वाद को यह कहते समाप्त कर दिया कि जब ओवरब्रिज का निर्माण नहीं हुआ तो प्रार्थी के आवेदन का आधार नहीं बचा।
सवाल, जिनके चाहिए जवाब-
- आरओबी निर्माण में किसे नुकसान हो रहा था?
- 40 पेड़ कटने थे, लेकिन वाद में हजारों किसने लिखवाए?
- गायों की सेवा करने वाले मजदूर को एनजीटी का रास्ता किसने दिखाया?
- एनजीटी की रोक नहीं होने के बाद भी अधिकारियों ने रोक का बहाना क्यों बनाया?
- आरओबी पर रोक नहीं थी, फिर भी नगर परिषद सर्वोच्च न्यायालय क्यों गई?
-आखिर वो कौन है, जिसे आरओबी नहीं बनने से फायदा हुआ और कितना लाभ हुआ?
Published on:
20 Dec 2022 11:58 am
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