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पेच के बालाजी : भीलवाड़ा के धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास का केंद्र

96 साल पुराना मंदिर, स्वयं भू हनुमान प्रतिमा और बालाजी मार्केट की पहचान

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Pech Ke Balaji: The Center of Religious and Cultural History of Bhilwara

Pech Ke Balaji: The Center of Religious and Cultural History of Bhilwara

भीलवाड़ा शहर के बीचोंबीच स्थित बालाजी मार्केट न केवल व्यापार का प्रमुख केंद्र है, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहां स्थित बालाजी मंदिर भक्तों की आस्था का केंद्र है। यहां विराजमान हनुमानजी की प्रतिमा जमीन से स्वयं प्रकट हुई थी।

1929 में मंदिर का विकास

करीब 96 वर्ष पूर्व प्रतिमा खुले आसमान के नीचे विराजमान थी। 1929 में गजाधर मानसिंहका ने यहां छाया करवाई थी। इसके लिए पेच की जमीन लेकर कमरा बनाया। सीतारामजी मानसिंहका के सान्निध्य में मंदिर की सेवा का कार्य पंडित गोविंदराम शर्मा ने लंबे समय तक किया। भक्तों के प्रयास से शिव परिवार और श्रीराम दरबार की स्थापना भी की गई। यहां मंगलवार और शनिवार को श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। व्यापारी रोज़ दुकान खोलने से पहले बालाजी के दर्शन करने आते हैं। यहां की बावड़ी, कॉटन फैक्ट्री, पाठशाला और मंदिर परिसर सब मिलकर एक ऐसा इतिहास बुनते हैं जो शहर की संस्कृति, व्यापार और भक्ति को एक सूत्र में जोड़ता है।

यहां चलती थी पाठशाला

मंदिर परिसर में पहली से तीसरी कक्षा तक की पाठशाला चलती थी। प्रभु दयाल बच्चों को पढ़ाते थे। यहां पढ़े विद्यार्थियों में आज भी उस दौर की यादें ताज़ा है।

कॉटन जिंनिंग का बड़ा केंद्र

1930–35 के बीच मेवाड़ के महाराणा भूपाल सिंह की कॉटन एवं जिनिंग फैक्ट्री थी। मजदूर और किसान मंदिर के पीछे वाली खिड़की से दर्शन करते थे। आसपास का इलाका ‘पेच’ के नाम से प्रसिद्ध था, क्योंकि कपास की खरीद–फरोख्त यहीं होती थी। इसी कारण इस मंदिर को पेच के बालाजी भी कहते हैं।

बालाजी मार्केट : व्यापारिक हृदय

बालाजी मंदिर के कारण ही इस पूरे इलाके का नाम बालाजी मार्केट पड़ा। कभी यह शहर का मुख्य बाजार हुआ करता था, जहां से पूरे बाजार में बावड़ी के पानी की कावड़ द्वारा सप्लाई की जाती थी। करीब 150 से अधिक दुकानें आज भी यहां संचालित हैं। इनमें कपड़े, सोने–चांदी, इलेक्ट्रॉनिक्स, स्टेशनरी, गारमेंट्स, जूते–चप्पल आदि का व्यापार होता है।

स्थानीय जनों की जुबानी

बालाजी मार्केट भीलवाड़ा का मुख्य बाजार था। तीसरी कक्षा तक प्रभु दयाल ने पढाया था। बावड़ी का पानी दुकानों तक पहुंचता था।

-एम.के. जैन, ईओ, मेवाड़ चैंबर ऑफ कॉमर्स

यहां 70 साल पहले पाठशाला चलती थी। मैंने भी यहां पढ़ाई की है। मंदिर की सेवा पंडित गोविंदराम शर्मा करते थे। 70 साल से यहां मंदिर आ रहा हूं।

- गणपत लाल मुछाल

मैं पिछले 65 वर्षों से नियमित दर्शन के लिए आता हूं। पेच के कारण इस मंदिर को पेच के बालाजी कहते हैं। यहां की हर श्रद्धा पूरी होती है।

- पन्नालाल जोशी, वरिष्ठ नागरिक

स्वयं भू प्रतिमा

मंदिर में स्थापित हनुमानजी की प्रतिमा स्वयं भू है। भक्तों की मान्यता है कि बालाजी महाराज हर सच्ची मनोकामना पूरी करते हैं।

पंडित आशुतोष शर्मा, पूजारी बालाजी मंदिर

इतिहास की झलक

  • 1929: गजाधर मानसिंहका ने मंदिर पर छाया करवाई।
  • 1930–35 में कॉटन जिंनिंग फैक्ट्री चलती थी।
  • 50 वर्ष पूर्व शिव परिवार की स्थापना हुई थी।
  • 35 वर्ष पूर्व: श्रीराम दरबार की स्थापना हुई थी।