
चन्द्रशेखर आजादनगर कॉलोनी की प्रेमदेवी जीनगर एेसा नाम है, जो 300 साल पुरानी छपाई कला को जीवन्त रखने में जुटी है
भीलवाड़ा।
चन्द्रशेखर आजादनगर कॉलोनी की प्रेमदेवी जीनगर एेसा नाम है, जो 300 साल पुरानी छपाई कला को जीवन्त रखने में जुटी है। राजा महाराजाओं के काल में उनकी पोशाकों व रानियों के कपड़ों पर सोने व चांदी की छपाई की जाती थी, जो अब विलुप्त होती जा रही है लेकिन प्रेमदेवी इसे बचाने में लगी है।
40 साल पहले बालिका वधु बनकर आई प्रेमदेवी को यह कला ससुर राधेश्याम जीनगर (80) से विरासत में मिली है। दादा ससुर खाजुलाल व ससुर राधेश्याम ने लंबे अर्से तक इस कला को जिंदा रखा।अब 40साल से प्रेमदेवी इसे बचाए हुए है।वह अपनी बेटी सुनीता को भी यह सीखा रही है। शादी में फेरों से पहले दुल्हन को उसके मामा द्वारा पहनाई जाने वाली मामा चूनर में एेसी कला देखने को मिल जाती है।
मामा चूनर में सोने के वर्क का चलन अब खत्म हो गया लेकिन चांदी वर्क चल रहा है। साडि़यो के साथ ही सलवार सूट व अन्य परिधानों पर चांदी का वर्क व छपाई प्रेमदेवी अभी भी बिना मशीन का इस्तेमाल करते हाथों से कर रही है। सरेज, खडि़या, मिट्टी, अलसी का तेल, राल को मिलाकर पेस्ट तैयार कर इसे अलग- अलग डिजाइनों के पीतल के ठप्पों (छापों) में भरा जाता है। बाद में साड़ी व सलवार सूट पर छपाई की जाती है। इस पर चांदी व सोने का वर्क लगाकर सुखाया जाता है। सुखने के बाद उलटा कर चिकनें पत्थर से घुटाई की जाती है।
रबर व स्क्रीन प्रिंट ने ली सोने चांदी की जगह
आज पहनावे से सोने चांदी का वर्क लुप्त होता जा रहा है। रबर व स्क्रीन प्रिन्ट की साडि़यां व सलवार सूट का क्रेज बढ गया है। रबर व स्क्रीन प्रिन्ट की साडि़यों में हजारों वैरायटी है। महंगी होने के कारण अब सोने व चांदी के वर्क लगी साडि़यां महिलाओं की पसंद से दूर होती जा रही है।
इन पर भी होती थी छपाई
प्राचीन काल में राजा-रानी व पूंजीपति सोने व चांदी की छपाई युक्त पगड़ी, कमरबंद, ओढनी, घाघरा, चुनर पहनते थे। देवताओं को चढाएं जाने वाले वस्त्रों पर भी यह छपाई विशेष रूप से दिखती थी। राजा-महाराजाओं के बाद पुराने लोगो ने भी एेसे वस्त्रों को लम्बे समय तक धारण किया। लेकिन अब एेसे वस्त्र विवाह में दुल्हन को सात फेरों के वक्त पहने हुए देखा जा सकता है।
Published on:
16 Apr 2018 02:22 pm
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