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प्री-वेडिंग शूट, म्यूजिकल फेरे और बेबी शॉवर सामाजिक विकृति, सादगी अपनाएं

आरके कॉलोनी आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में मुनि प्रणीत सागर ने आधुनिक जीवनशैली और दिखावे पर किया प्रहार

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प्री-वेडिंग शूट, म्यूजिकल फेरे और बेबी शॉवर सामाजिक विकृति, सादगी अपनाएं

आधुनिक जीवनशैली, मोबाइल, सोशल मीडिया और दिखावे की अंधी दौड़ ने समाज में नई बुराइयों को जन्म दे दिया है। लोग एक-दूसरे की देखा-देखी अनावश्यक खर्च और आडंबरपूर्ण आयोजनों में लिप्त हो रहे हैं। इससे सामाजिक संतुलन बिगड़ रहा है। म्यूजिकल फेरे, बेबी शॉवर और प्री-वेडिंग शूट जैसी तेजी से पनप रही परंपराएं हमारी संस्कृति और सादगीपूर्ण जीवनशैली के विपरीत हैं। यह एक सामाजिक विकृति है। यह बात मुनि प्रणीत सागर ने शुक्रवार सुबह आरके कॉलोनी स्थित दिगम्बर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में कही। ग्रीष्मकालीन वाचना के दौरान बड़ी संख्या में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित करते हुए मुनि ने दिखावे की प्रवृत्ति से दूर रहकर संयम और धर्मपरायणता अपनाने का आह्वान किया।

विपरीत परिस्थितियों में समभाव ही सच्ची साधना

मुनि प्रणीत सागर ने सम्यक दर्शन के महत्व को समझाते हुए कहा कि संसार की उथल-पुथल के बीच अपने भावों में शांति बनाए रखना ही वास्तविक साधना है। विरोधियों और विपरीत परिस्थितियों के प्रति समभाव रखना सम्यक दर्शन का प्रमुख लक्षण है। उन्होंने सम्यक दर्शन के चार प्रमुख गुणों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

  • - प्रशम: मन के विकारों को शांत रखना और बाहरी घटनाओं से प्रभावित हुए बिना संतुलित दृष्टि बनाए रखना। क्रोध और अशांति से ऊपर उठकर आत्मिक शांति पाना।
  • - संवेग: संसार में हो रही हिंसा, पाप और अनैतिक क्रियाओं को देखकर विचलित होना और उनसे दूर रहने की प्रेरणा लेना।
  • - अनुकम्पा: एक इन्द्रिय सूक्ष्म जीव से लेकर पंचेन्द्रिय प्राणी तक, सभी जीवों के प्रति करुणा और दया का भाव रखना ही अहिंसा का आधार है।
  • - आस्तिक्य: जिनेन्द्र भगवान के उपदेशों के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास रखना। इन चारों गुणों के विकास से ही जीवन सार्थक और धर्ममय बन सकता है।

दिखावे का साधन बने देव-शास्त्र-गुरु, अभय कोष की दरकार

मुनि प्रणीत सागर समाज की वर्तमान दिशा पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज लोग देव, शास्त्र और गुरु को भी अपनी सुविधा और दिखावे का माध्यम बना रहे हैं, जबकि इनका मूल उद्देश्य आत्मा की शुद्धि और मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ना है। मुनि ने समाज के आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों की सुरक्षा व सहयोग के लिए अभय कोष बनाने की सख्त आवश्यकता पर बल दिया।