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कॉरपोरेट की नौकरी छोड़ बने किसान, 7.5 एकड़ में उगा रहे सेहत, सालाना कमा रहे 10 लाख

कॉरपोरेट की नौकरी छोड़ बने किसान, 7.5 एकड़ में उगा रहे सेहत, सालाना कमा रहे 10 लाख

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Quit Corporate Job to Become a Farmer; Cultivating 'Health' on 7.5 Acres and Earning ₹10 Lakh Annually.

कॉरपोरेट की नौकरी छोड़ बने किसान, 7.5 एकड़ में उगा रहे सेहत, सालाना कमा रहे 10 लाख

आधुनिक युग में जहां युवा खेती छोड़कर शहरों की ओर भाग रहे हैं, वहीं कॉरपोरेट जगत के एक दिग्गज ने इसके उलट मिसाल पेश की है। लगभग 29 वर्षों तक कॉरपोरेट सेक्टर के शीर्ष पदों पर आसीन रहने और लाखों रुपए का पैकेज लेने के बाद, त्रिपाठी ने प्रकृति की ओर लौटने का साहसिक निर्णय लिया। आज वे न केवल एक सफल किसान हैं, बल्कि 'अहिंसक और प्राकृतिक खेती' के जरिए समाज को बेहतर स्वास्थ्य और किसानों को मुनाफे की राह दिखा रहे हैं।

संकल्प: रसायनों के विरुद्ध एक युद्ध

बिना किसी कृषि पृष्ठभूमि के इस सफर को शुरू करना त्रिपाठी के लिए आसान नहीं था। उनकी इस यात्रा के मूल में एक गहरी चिंता थी कि बाजार में उपलब्ध रसायनों और कीटनाशकों से युक्त भोजन, जो कैंसर और मधुमेह जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन रहा है। इसी 'जहर' से मुक्ति दिलाने के संकल्प के साथ उन्होंने 2021 में जमीन खरीदी। अपने ज्ञान को वैज्ञानिक आधार देने के लिए उन्होंने राष्ट्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र, गाजियाबाद से 'मास्टरट्रेनर' का प्रशिक्षण लिया और कृषि विज्ञान केंद्र , भीलवाड़ा के वैज्ञानिकों के सानिध्य में अपनी तकनीकी बारीकियों को निखारा।

बाजार पर निर्भरता खत्म: घर में ही बना 'अमृत'

त्रिपाठी की सफलता का सबसे बड़ा रहस्य बाजार के महंगे उर्वरकों और कीटनाशकों का पूर्ण बहिष्कार है। वे अपने खेत के लिए आवश्यक पोषण और सुरक्षा स्वयं तैयार करते हैं:

  • पोषण: गाय के गोबर और गोमूत्र की सहायता से वे बीजामृत, जीवामृत और घनजीवामृत तैयार करते हैं।
  • सुरक्षा: कीटों से बचाव के लिए वे नीम अस्त्र और ब्रह्मास्त्र जैसे पारंपरिक और प्राकृतिक विकल्पों का उपयोग करते हैं।
  • परिणाम: वैज्ञानिक नवाचारों जैसे मल्चिंग और फसल चक्र को अपनाने से उनके खेत की मिट्टी का जैविक कार्बन, जो कभी महज 0.23 था, अब बढ़कर 0.55 हो गया है। यह मिट्टी की उर्वरता में हुए क्रांतिकारी सुधार का प्रमाण है।

विविधता और वैल्यू एडिशन: मुनाफे का मंत्र

त्रिपाठी ने पारंपरिक खेती के ढर्रे को तोड़कर 7.5 एकड़ के खेत में 'मिश्रितखेती' का मॉडल खड़ा किया है। उनके खेत में काला गेहूं, औषधीय फसलें, सब्जियां और विभिन्न फल (जैसे अंजीर, अमरूद और आम) एक साथ लहलहा रहे हैं।

सिर्फ फसल उगाना ही उनका लक्ष्य नहीं था। उन्होंने समझा कि मुनाफा तब बढ़ेगा जब बिचौलियों की भूमिका खत्म होगी। उन्होंने अपने उत्पादों का 'वैल्यूएडिशन' (मूल्य संवर्धन) किया; जैसे टमाटर बेचने के बजाय उसका सॉस तैयार करना। आज वे सीधे भीलवाड़ा, गुरुग्राम और अजमेर के जागरूक ग्राहकों तक अपनी उपज पहुँचा रहे हैं, जिससे वे सालाना 10 लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं।

बदलाव के प्रणेता और सरकारी सम्मान

त्रिपाठी अब अकेले नहीं हैं। उनके खेत पर अब तक 530 से अधिक किसान भ्रमण कर चुके हैं और उनसे प्रेरित होकर 20 किसानों ने पूर्णतः प्राकृतिक खेती को अपना लिया है। उनके इस निस्वार्थ योगदान को देखते हुए जिला प्रशासन ने 15 अगस्त को उन्हें सम्मानित किया। वर्तमान में वे महाराणा प्रताप कृषि विश्वविद्यालय के साथ मिलकर आधुनिक कृषि मॉडल विकसित करने पर काम कर रहे हैं और साथी किसानों को मुफ्त प्रशिक्षण व जीवामृत उपलब्ध कराकर एक स्वस्थ भारत की नींव रख रहे हैं।