
महाराणा सांगा के हजारों साल पहले भीलवाड़ा जिले में कोटड़ी तहसील के चावण्डिया में वीरगति को प्राप्त हुए थे।
भीलवाड़ा।
मेवाड़ के पूर्व शासक एवं महाराणा प्रताप के पूर्वज महाराणा सांगा के हजारों साल पहले भीलवाड़ा जिले में कोटड़ी तहसील के चावण्डिया में वीरगति को प्राप्त हुए थे। सांगा ने ये लड़ाई मुगलों के खिलाफ लड़ी थी। वे मांडलगढ़ क्षेत्र में मुगल सेना पर तलवार से गरजे थे, यहीं उनका सिर कट कर गिर गया था, लेकिन उनका धड़ घोड़े की लगाम थामे रहा और वो बाद में चावण्डिया में गिरा था।
यहां चावंडिया तालाब क्षेत्र में खुदाई के दौरान सालों पहले मिले कंकालों व अवशेषों का उदयपुर पुरात्व विभाग की टीम ने अध्ययन किया है। पत्रिका टीम ने जिला मुख्यालय से 18 किलोमीटर दूर चावंडिया तालाब में पुरात्व विभाग की ओर से सालों पहले जुटाए साक्ष्यों का अवलोकन कर यहां लगे शिलालेख देखे एवं पुराविदों से चर्चा की तो ये चावंडिया में सांगा के वीरगति को प्राप्त होने का खुलासा हुआ।
पाल पर बिखरा पत्थर अहम
हां की प्राचीन जैन मंदिर के अवशेष मिलते हैं। उनमें कई पत्थर तालाब की पाल में लगा दिए। कुछ पाल पर बिखरे पड़े हैं। तालाब में चामुण्डा माता मंदिर है। इसके पास सगसजी का स्थान है। इसे राजपूत राणा के स्मारक के रूप में पूजते हैं। मेवाड़ महाराणा परिवार के लोग एवं जुड़े अधिकारी खोज के लिए यहां आ चुके है। यह गांव गुर्जरों ने बसाया था पर अभी यहां एक भी गुर्जर परिवार नहीं है। जैन मंदिर के भग्नावेश प्राप्त होने के बावजूद यहां कोई जैन परिवार नहीं है।
धड़ लड़ता रहा
इतिहास में झांके तो लोग इसे मेवाड़ के महाराणा सांगा का बलिदान स्थल बताते हैं। इसके प्रमाण के रूप में शिलालेख भी है। जो आम लोगों के पढऩे में नहीं आता है। कहते हैं कि युद्ध में महाराणा का सिर माण्डलगढ़ की धरती पर गिरा लेकिन घुडसवार धड़ लड़ता चावण्डिया तालाब के पास वीरगति को प्राप्त हुआ।
परिजन आते हैं
तालाब में चामुण्डा माता का मंदिर के साथ ही सगसजी का स्थान है। इसे राणा सांगा के नाम से जानते है। इस बारे में उनके परिजन जानते है। वे यहां आते रहते है।
भवानीराम प्रजापत, पुजारी, चामुण्डा माता मंदिर, चावण्डिया
शिलालेख की करनी होगी सुरक्षा
तालाब के पास रखे प्राचीन शिलालेख से ज्ञात होता है कि यहां राणा सांगा शहीद हुए थे। इस शिलालेख को स्मारक के रुप में खड़ा किया जाना चाहिए। चामुण्डा माता मंदिर की प्रतिमा को भी मुगलों ने खण्डित कर दिया था। इनको देखने के लिए दरबार के कामदार यहां आए थे। खोजबीन के बाद बताया कि राणा सांगा के निशान इसी चावण्डिया में मिले है। जबकि एक चावण्डिया गांव माण्डलगढ के जालियां के पास भी है, जहां किसी तरह का इतिहास नजर नहीं आता है।
गणपतलाल शर्मा, पूर्व प्राध्यापक
तालाब व इतिहास होगा संरक्षित
चावंडिया तालाब में 112 प्रजातियों के पक्षी आते हैं, ये बड़ी बात है। यहां की विस्तृत रिपोर्ट मंगवाई है। यहां बर्ड फेयर सहित विदेशी पर्यटक कैसे आ सके इसलिए प्लान तैयार करवा रहे हैं ताकि इस जगह को और अधिक सुंदर बनाया जा सके। यहां का जो भी इतिहास है उसे संरक्षित किया जाएगा।
मुक्तानंद अग्रवाल, जिला कलक्टर
Published on:
25 Nov 2017 10:07 pm

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