
खदानों में बिखरी पड़ी अभ्रक, खुदाई महंगी होने से कारोबारियों ने हाथ खींचे
जयप्रकाश सिंह.सुरेश जैन
भीलवाड़ा. भीलवाड़ा समेत प्रदेश के कई जिलों में जमीन के अंदर अभ्रक [माइका] बिखरा पड़ा हैं, लेकिन सरकारी नीति और अत्याधुनिक तकनीक के अभाव में प्रदेश में अभ्रक का खनन नाम मात्र का रह गया है। खनन महंगा होने के कारण ज्यादातर खदान मालिकों ने इससे हाथ खींच लिए हैं। झारखण्ड के बाद राजस्थान के भूगर्भ में अभ्रक बड़ी मात्रा है। छह दशक पहले तक अभ्रक उत्पादन में विशेष पहचान रखने वाले भीलवाड़ा में अधिकांश खदानें अब बंद है। इन खदानों के अंदर अभी भी अभ्रक दबा पड़ा हुआ है। आसपास के गांवों के मजदूर इन खदानों से अभ्रक बीनकर सस्ते दामों पर व्यापारियों को बेच रहे हैं।
महंगी लागत के कारण सिमटा कारोबार
खदान मालिकों के अनुसार जमीन के अंदर अभ्रक की वेन [पट्टी] होती है। इस पट्टी की खुदाई कर अभ्रक निकाला जाता है। बरसों पहले भीलवाड़ा में ओपन कॉस्ट करके जमीन से अभ्रक निकाल लिया गया। अब खुली खदानों में मलबा रह गया है। ऐसे में अभ्रक निकालने के लिए खदानों में अंडरग्राउण्ड खुदाई की जरूरत है, जो कि खदान मालिकों के लिए बहुत महंगी पड़ रही है, ऐसे में अधिकांश खदानों से अभ्रक की खुदाई बंद कर दी गई।
फेल्सपार के साथ निकल रहा
जानकारों के अनुसार जिले में फेल्सपार क्वार्ट्ज के साथ अभ्रक निकल रहा है, इन्हें पिगमेटाइट मिनरल की श्रेणी में माना जाता है। लेकिन खनन विभाग ने फेल्सपार क्वार्ट्ज की लीज में अभ्रक को शामिल नहीं किया। ऐसे में इन खदानों से अभ्रक के खनन को अवैध माना जा रहा है। यदि खनन विभाग लीज में फेल्सपार के साथ अभ्रक का खनन भी जोड़ दे तो यहां अभ्रक का खनन वैध हो सकता है और उसकी विदेशों में निर्यात की प्रचुर संभावनाएं है। खरीदार अभ्रक को लीगल माइन्स से खरीदना चाहते है, जबकि जिले में फेल्सपार के साथ निकल रहा अभ्रक अवैध तरीके से बाहर भेजा रहा है।
1950 से 75 तक में शिखर पर था
देश में झारखंड, राजस्थान, आंध्रप्रदेश, बिहार समेत कई राज्यों में अभ्रक का उत्पादन होता है। जानकारों के अनुसार प्रदेश में १९५० से १९७५ तक अभ्रक का व्यवसाय शिखर पर था। उस समय सैकड़ों खदानों से अभ्रक निकालकर बाहर भेजा था। प्रदेश में अभ्रक की खदानों में बीस हजार से अधिक मजदूर काम करते थे, लेकिन धीरे-धीरे अभ्रक का कार्य कम हो गया।
सिमट गया कारोबार
अभ्रक के कारोबारी दिलीप जैन के अनुसार अभ्रक उत्पादन की दृष्टिï से भीलवाड़ा का प्रदेश में प्रमुख स्थान रहा है, लेकिन अब उन्नत तकनीक के महंगी होने के कारण जिले में इसकी अधिकांश खदानें बंद हैं। इन खदानों में और आसपास की जमीन में अभ्रक मलबे के साथ बिखरा पड़ा है। भीलवाड़ा में 50 से अधिक छोटी-बड़ी की खदाने हैं, लेकिन वर्तमान में कुछ में ही खुदाई का कार्य चल रहा है।
प्रदेश में यहां पाया जाता है
राजस्थान के भीलवाड़ा, राजनगर, बांसवाड़ा, अजमेर, नसीराबाद, किशनगढ़, टोंक, केकड़ी, देवगढ़ समेत अन्य जिलों में अभ्रक पाया जाता है। पहले माइका मेजर मिनरल था। लेकिन अब क्वाट्र्स फैल्सफार की खदानों में निकल रहा है।
चीन और जापान में नया निर्यात
देश में सबसे अच्छा अभ्रक झारखण्ड में पाया जाता है। राजस्थान में मिलने वाली अभ्रक की गुणवत्ता कम है। भीलवाड़ा का अभ्रक ६ मिलीमीटर से लेकर ३ इंच तक का होता है। यह चीन, फ्रांस, जर्मनी, जापान को निर्यात किया जा रहा है। जिले की खदानों में सफेद, पीली और व श्याम रंग की अभ्रक निकलती है। इसमें कई उच्च किस्म की होती है, जो निर्यात होती है। अभ्रक की कटिंग करने के बाद इसकी पैकिंग करके विदेशों में भिजवाया जाता है। इसके अलावा पावडर भी तैयार किया जाता है।
दो से बीस रुपए किलो तक कीमत
जिले के कई इलाकों में खदानों में मलबे में बिखरी अभ्रक को मजदूर बीनकर दो से बीस रूपए किलोग्राम तक बेच रहे हैं। यह अभ्रक फैक्ट्री में पाउडर बनाकर बाहर बेचा जा रहा है।
इस काम में आता है अभ्रक
अभ्रक की पतली-पतली परतों में विद्युत रोकने की क्षमता होती है। यह पारदर्शक और तापरोधक होता है। इसका उपयोग बिजली के उपकरण, स्टोव, चिमनी, पेपर बनाने, सीट बनाने के काम आती है।
----
बहुत कम निकल रहा अभ्रक
जिले में अब माइका का खनन बहुंत कम है। पहले अभ्रक उत्पादन होने के कारण इसकी बड़ी-बड़ी कंपनियां थी, लेकिन अब काम बंद हो गया है। इसकी रॉयल्टी भी कम मिलती है।
अरविन्द नन्दवाना, अधीक्षण अभियन्ता खनिज, विभाग भीलवाड़ा
Published on:
12 Sept 2021 10:06 pm
बड़ी खबरें
View Allभीलवाड़ा
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
