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नि:स्वार्थ सेवा ही फलदायी-आचार्य महाश्रमण

कषाय को उपशांत करके प्रतिक्रिया विरति की साधना की जा सकती

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नि:स्वार्थ सेवा ही फलदायी-आचार्य महाश्रमण

नि:स्वार्थ सेवा ही फलदायी-आचार्य महाश्रमण

भीलवाड़ा।
आचार्य महाश्रमण ने वैयावृत्य की विवेचन की। उन्होंने कहा कि सेवा करना वैयावृत्य कहलाता है। किसी के उपकार के लिए कुछ करना, रोगी, अक्षम की सेवा करना वैयावृत्य होता है। भीतर में जब अहिंसा व करुणा के भाव जाग्रत होते है तब आत्मा किसी साधु या व्रती-त्यागी की सेवा सुश्रुषा के लिए तत्पर होती है। नि:स्वार्थ भावना से की सेवा फलदायी होती है।
आचार्य ने कहा कि तेरापंथ धर्मसंघ में स्थविर, तपस्वी, ग्लान की सेवा करने का संस्कार परंपरा से है। वृद्ध स्थविर साधु-साध्वियों की चित्त समाधि बनी रहे। उनको समुचित सेवा मिलती रहे, ऐसा प्रयास रहना चाहिए। कोई भी अपने आप में असहाय न बने, ऐसी स्थिति साधु संस्था में वांछनीय है। हमारे भीतर वैयावृत्य की भावना जागे, ये ऐसा तप है जिसके लिए कहा गया कि इससे तीर्थंकर नाम गोत्र का बंध होता है।
साध्वी संबुद्धयशा ने कहा कि कषाय को उपशांत करके प्रतिक्रिया विरति की साधना की जा सकती है। निमित्त चाहे जो हो सम्यक तरीके से उनका सामना करना चाहिए। मुदित डागा ने आचार्य से अठाई का प्रत्याख्यान किया। आचार्य के समक्ष समण संस्कृति संकाय, जैन विश्व भारती लाडनूं की ओर से जैन विद्या परीक्षा का बैनर का विमोचन हुआ। एनएसयूआई यूथ प्रदेश अध्यक्ष अभिषेक चौधरी, कवि योगेन्द्र शर्मा, नरेश शांडिल्य ने आचार्य पर आधारित पुस्तक मैनेजमेंट गुरु का विमोचन किया।